कल हो ना हो और सलाम ए इश्क जैसी फिल्मों के निर्देशक निखिल आडवाणी की दिलचस्पी इन दिनों इतिहास और वास्तविक घटनाओं में ज्यादा दिख रही है। मुंबई डायरीज 26/11, द एंपायर और राकेट ब्वायज वेब सीरीज के बाद उन्होंने भारत-पाक विभाजन पर आधारित वेब सीरीज फ्रीडम एट मिडनाइट (Freedom at Midnight) बनाई थी।
अब फ्रीडम एट मिडनाइट का दूसरा सीजन आज (नौ जनवरी) से सोनी लिव पर स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध है। इसके अलावा निखिल आडवाणी इतिहास पर ही आधारित कुछ और शो भी बना रहे हैं। उन्होंने दैनिक जागरण के साथ बातचीत में इस शो और इतिहास से जुड़ी दिलचस्पी और चुनौतियों पर बात की है।
क्या कारण है कि कल हो ना हो जैसी फिल्म बनाने वाले निर्देशक की रुचि इतिहास में अब ज्यादा दिख रही है?
इतिहास में मेरी हमेशा से बड़ी रुचि रही है। मैं जब कभी लाइब्रेरी या किताबों की दुकान पर जाता हूं तो सीधा इतिहास की किताबों वाले सेक्शन में पहुंचता हूं। हालांकि, ऐसा भी नहीं है कि जो व्यक्ति आज इतिहास की किताबें पढ़ रहा है, वो कल हो ना हो बनाने वाले निर्देशक से अलग है। इतिहास की कहानियां बताने में मैं सहज महसूस करता हूं।
क्या इतिहास को उस तरह से दिखा पाना संभव है, जिससे सभी संतुष्ट हो ?
बिल्कुल नहीं। हमेशा कोई न कोई ऐसा होगा जो कहेगा कि आपने गलत दिखाया है या मुझे इसके बारे में बेहतर पता है। कोई ऐसा भी होगा, जो कहेगा कि आपको ऐसी कहानी बताने की कोशिश ही नहीं करनी चाहिए थी।
इतिहास को स्क्रीन पर दिखाने की सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
इतिहास की घटनाएं और लोगों को सही तरीके से दिखाने, उन्हें जो दर्जा या प्रतिष्ठा मिली है, उसकी गरिमा बनाए रखने की जिम्मेदारी सबसे बड़ी चुनौती होती है, हर घटना के प्रति लोगों का अलग-अलग नजरिया होता है, तो यह जिम्मेदारी भी होती है कि स्क्रीनप्ले लिखने से पहले क्या हमने दूसरे लोगों के नजरिये को भी समझा है? इसलिए, शो के माध्यम से दर्शकों को मैं यह नहीं बताना चाहता कि यह मेरा नजरिया है या मुझे क्या सही लगता है में दर्शकों को सिर्फ उन परिस्थितियों और उन कमरों में लेकर जाना चाहता हूं, जहां अपने देश से जुड़े इतने महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए।
क्या शो बनाने के बाद किसी नए तथ्य के बारे में पता चला?
हां, पहले सीजन में जब हमने दिखाया था कि गांधीजी ज्यादा वोट पाने के बाद भी प्रधानमंत्री पद सरदार वल्लभभाई पटेल की जगह नेहरू को दे देते हैं। मैं किसी ऐसे व्यक्ति से मिला, जो मणिबेन पटेल ( सरदार पटेल की बेटी) को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि वैसा नहीं हुआ था। कमेटी के सभी लोगों ने सरदार वल्लभभाई पटेल के लिए वोट नहीं किया था। एक व्यक्ति ने नेहरू जी के लिए वोट किया था और वो थे सरदार पटेल। क्योंकि वह अपनी सेहत के बारे में जानते थे कि वो दिल के मरीज हैं। उन्हें पहले ही दो हार्ट अटैक आ चुके थे।
ऐसे में कई आरोप भी लगते हैं (फिल्मकार विवेक रंजन अग्निहोत्री ने निखिल पर जानबूझकर गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया था )। क्या कभी उनके जवाब देना भी जरूरी समझते
हैं?
मैं अपनी बीवी को हमेशा कहते रहता हूं कि आपने मुझे गलत समझा। मैं आरोप लगाने वालों को भी यही बोलूंगा। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि आपकी कहानी की शुरुआत कहां से हो रही है। मैं कहानी के माध्यम से किसी व्यक्ति या संस्था को उकसाने का काम नहीं कर रहा हूं।
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