ईद-उल-फित्र के करीब दो महीने के बाद ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। यह इस्लाम धर्म को मनाने वालों के लिए प्रमुख त्योहार है जिसे बकरीद के नाम से जाना जाता है। इस साल यह त्योहार 2 सितंबर को मनाया जा रहा है। बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने के बाद अपनी प्रिय चीज की कुर्बानी देते है। 

इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार ईद-उल-जुहा 12वें महीन धू-अल-हिज्जा के 10वें दिन मनाई जाती है। बकरीद को अल्लाह की राह में कुर्बानी का त्योहार कहा जाता है। इस दिन खुदा के बंदे अपनी सबसे प्रिय चीज को अल्लाह के लिए कुर्बानी देते है। मुस्लिम समुदाय के लोग इस दिन बकरे या किसी अन्य पशुओं की कुर्बानी देते है।
इस्लाम में बकरीद को सुन्नते इब्राहीम भी कहा जाता है। एक बार अल्लाह ने हजरत इब्राहिम को अपनी सबसे प्रिय वस्तु को कुर्बान करने का आदेश दिया। हजरत इब्राहिम का एक बेटा था जो शादी के कई सालो के बाद पैदा हुआ था जिसकी वजह से उन्हें सबसे प्रिय था, लेकिन अल्लाह की राह में उन्होने अपने बेटे की बलि देना के लिए तैयार हुए।
हजरत इब्राहिम ने जब अपने बेटे की कुर्बानी देने के लिए अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर जैसे ही बेटे के गले में चाकू रखकर कटा तो उसी समय उनके बेटे की जगह भेंड़ का कटा हुआ पड़ा मिला तभी से इस्लाम में बकरीद के दिन कुर्बानी देने की परम्परा शुरू हुईं।
बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय के लोग पशु की कुर्बानी देते हैं। इस दिन कुर्बानी के लिए बकरे और भे़ड़ को पाला घर में पाला जाता है। बकरीद के दिन सुबह-सुबह नमाज अदा की जाती है और इसके बाद कुर्बानी दी जाती है और यह कुर्बानी तीन दिनों तक चलती है।
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