हमारी आज की लाइफस्टाइल में हम अक्सर अपनी शारीरिक फिटनेस और खान-पान पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन जिस वातावरण में हम रहते हैं और जिन सामाजिक परिस्थितियों से हम गुजरते हैं, वे हमारे मस्तिष्क पर क्या असर डाल रही हैं, इस पर गौर करना भूल जाते हैं।
हाल ही में 34 देशों के 18,701 लोगों पर किए गए एक अध्ययन ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि प्रदूषण, गरीबी और सामाजिक अकेलापन मिलकर हमारे दिमाग के बूढ़ा होने की गति को 9 गुना तक बढ़ा सकते हैं। यह शोध केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य की बात नहीं करता, बल्कि उस एक्सपोजोम की ओर इशारा करता है, जिसमें हम सांस लेते हैं और जीते हैं। आइए जानें इस बारे में।
जहरीली हवा और सिमटती हरियाली
अध्ययन के अनुसार, वायु प्रदूषण और खराब जल गुणवत्ता सीधे हमारे दिमाग की संरचना को प्रभावित करते हैं। जब हम प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, तो बहुत छोटे कण फेफड़ों से होते हुए ब्लड फ्लो के जरिए दिमाग तक पहुंच जाते हैं। इससे तीन समस्याएं पैदा होती हैं-
न्यूरोइन्फ्लेमेशन- दिमाग के टिश्यू में सूजन आना।
ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस- सेल्स का तेजी से डिजेनरेट होना।
ब्लड वेसल्स की खराबी- दिमाग को होने वाली ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा।
इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में ग्रीन स्पेस की कमी और बढ़ता तापमान तनाव के स्तर को बढ़ाता है, जिससे याददाश्त और भावनाओं को नियंत्रित करने वाला हिस्सा समय से पहले कमजोर होने लगता है।
गरीबी और असमानता का बोझ
चौंकाने वाली बात यह है कि गरीबी केवल जेब खाली नहीं करती, बल्कि दिमाग को भी सिकोड़ देती है। सामाजिक और आर्थिक असमानता के कारण व्यक्ति लगातार सर्वाइवल मोड में रहता है। संसाधनों की कमी दिमाग के उस हिस्से को प्रभावित करती है जो लॉजिकल थिंकिंग और कॉग्निटिव फंक्शन के लिए जिम्मेदार है। सामाजिक असुरक्षा के कारण पैदा होने वाला मानसिक तनाव न्यूरॉन्स के बीच के संपर्क को कमजोर कर देता है।
अकेलापन भी है एक कारण
अकेलापन आज के युग की एक मूक महामारी है। अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों के पास सोशल सपोर्ट की कमी है, उनके दिमाग में उम्र बढ़ने के लक्षण उन लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा थे, जो सामाजिक रूप से एक्टिव हैं। अकेलापन दिमाग में कोर्टिसोल के स्तर को बढ़ाता है, जो सीधे तौर पर हिप्पोकैम्पस को नुकसान पहुंचाता है।
दिमाग पर एक साथ वार
जब ये भौतिक और सामाजिक कारक एक साथ मिलते हैं, तो इनका प्रभाव केवल जुड़ता नहीं बल्कि गुना हो जाता है। उदाहरण के लिए, एक गरीब व्यक्ति जो प्रदूषित इलाके में रहता है और सामाजिक रूप से कटा हुआ है, उसका दिमाग एक सुरक्षित वातावरण में रहने वाले व्यक्ति की तुलना में 9 गुना तेजी से अपनी काम करने की क्षमता खो सकता है।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal