विश्व प्रसिद्ध हड़प्पाकालीन स्थल राखीगढ़ी में इतिहास के पन्ने पलटने की तैयारी है। इस बार खोदाई की रणनीति में बड़ा बदलाव किया गया है। पहले जहां खोदाई सातों टीलों के अंदरूनी हिस्सों तक सीमित थी, अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने टीलों के बाहरी किनारों पर उत्खनन शुरू करने का निर्णय लिया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि हड़प्पा काल में शहर या गांव की सीमाएं कैसी थीं और बाहरी भूमि का उपयोग खेती, कार्यस्थल या सुरक्षा घेरे के रूप में किस तरह किया जाता था।
खोदाई से पहले डिफरेंशियल ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (डीजीपीएस) की मदद से सर्वेक्षण का काम शुरू किया जा चुका है, ताकि टीलों की सटीक सीमाएं तय की जा सकें। पुरातत्वविदों का मानना है कि बाहरी किनारों की खोदाई से हड़प्पा काल की रक्षा व्यवस्था, सीमांत नियोजन और नगरीय विस्तार से जुड़ी अहम जानकारी मिल सकती है, जो अभी तक रहस्य बनी हुई थी।
एएसआई के महानिदेशक युद्धवीर सिंह रावत 22 जनवरी को राखीगढ़ी पहुंचकर खोदाई की औपचारिक शुरुआत करेंगे। इस बार की खोदाई एएसआई की उत्खनन शाखा द्वारा संचालित की जाएगी। विभाग को इस खोदाई के लिए तीन वर्षों का लाइसेंस मिला है।, और मौसम के हिसाब से खोदाई कई चरणों में की जाएगी। खोदाई में हिमाचल प्रदेश के शिमला विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय और ग्रेटर नोएडा के छात्र भी भाग लेंगे। फिलहाल 18 से 20 छात्र पहले ही राखीगढ़ी पहुंच चुके हैं, जो महानिदेशक के हाथों शुभारंभ के बाद खोदाई कार्य में हिस्सा लेंगे। वहीं, साइट नंबर 1, 2 और 3 पर सफाई का काम पूरा हो चुका है। अनुमान है कि शुरुआती खोदाई इन्हीं स्थलों पर की जाएगी।
राखीगढ़ी में अब तक हुई खोदाई का ब्योरा
पहली बार 1998 से 2000 के बीच साइट नंबर तीन पर खोदाई की गई थी, जिसका नेतृत्व एएसआई के तत्कालीन निदेशक डॉ. अमरेंद्र नाथ ने किया।
दूसरी बार 2011 से 2016 तक साइट नंबर एक पर खोदाई हुई थी, जिसका नेतृत्व प्रोफेसर वसंत शिंदे ने किया।
तीसरे चरण में 2023 से 2025 तक साइट नंबर सात पर खोदाई डॉ. संजय मंजुल के निर्देशन में की गई । अब तक हुई खोदाई के बाद साइटों को मिट्टी से ढक दिया जाता था, लेकिन पर्यटकों के लिए साइट नंबर तीन को खुला रखा गया है।
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