ट्रंप को अपनों ने ही दिया जोर का झटका, US प्रेसिडेंट द्वारा नियुक्त जजों ने टैरिफ को बताया अवैध

सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक करार दिया है। नौ-सदस्यीय पीठ में ट्रंप द्वारा नियुक्त दो जजों ने भी उनके खिलाफ फैसला सुनाया। मुख्य न्यायाधीश रॉबर्ट्स ने बहुमत का नेतृत्व किया, जिसमें कहा गया कि राष्ट्रपति के पास टैरिफ लगाने की शक्ति नहीं है। एक ट्रंप-नियुक्त जज, ब्रेट कैवना, ने असहमति जताई, तर्क दिया कि टैरिफ आयात को नियंत्रित करने का पारंपरिक उपकरण है।

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए वैश्विक टैरिफ को असंवैधानिक ठहरानेवाली सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यी पीठ में दो जज खुद ट्रंप के नियुक्त किए हुए हैं। हालांकि, ट्रंप ने कुल तीन जजों को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था, जिसमें एक- ब्रेट कैवना ने उनका साथ दिया और बहुमत के खिलाफ फैसला दिया।

बहुमत का पक्ष: राब‌र्ट्स, गोरसच, बैरेट और तीन उदारवादी न्यायाधीश
मुख्य न्यायाधीश राब‌र्ट्स ने अपने निर्णय में स्पष्ट लिखा, “आज हमारा कार्य केवल यह तय करना है कि आयात को ‘नियंत्रित’ करने की शक्ति क्या टैरिफ लगाने की शक्ति को समाहित करती है। ऐसा नहीं है।” अदालत ने माना कि 1977 का इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनामिक पावर्स एक्ट (आइईईपीए) राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का स्पष्ट अधिकार नहीं देता।

राब‌र्ट्स के साथ बहुमत में न्यायाधीश नील गोरसच और एमी कोनी बैरेट भी शामिल थे। इन दोनों जजों की नियुक्ति ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में की थी। इनके अलावा तीन उदारवादी न्यायाधीश—सोनिया सोतोमयोर, एलेना केगन और केतनजी ब्राउन जैक्सन—भी बहुमत में रहीं।

बहुमत ने “व्यापक प्रश्न सिद्धांत” का हवाला देते हुए कहा कि विशाल आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव वाले निर्णयों के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति आवश्यक है। संविधान के तहत कर और टैरिफ लगाने की शक्ति कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के।

अल्पमत: ट्रंप-नियुक्त न्यायाधीशों का विरोध
फैसले से असहमति जताने वालों में न्यायाधीश क्लेरेंस थामस, सैमुअल एलिटो और ब्रेट कैवना शामिल थे। कैवना, जिन्हें भी ट्रंप ने नियुक्त किया था, ने अपने असहमति मत में लिखा कि “टैरिफ आयात को नियंत्रित करने का पारंपरिक और सामान्य उपकरण है” और आइईईपीए का पाठ, इतिहास तथा पूर्व मिसालें प्रशासन के पक्ष का समर्थन करती हैं।कैवना ने चेतावनी दी कि इस निर्णय से चीन, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों पर अनिश्चितता पैदा हो सकती है।

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