अक्सर माना जाता है कि अकेलापन बुढ़ापे में मानसिक स्वास्थ्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। लेकिन हाल ही में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस धारणा को एक नया मोड़ दिया है। शोध के अनुसार, अकेलापन बुजुर्गों की याददाश्त को शुरुआती तौर पर कमजोर जरूर कर सकता है, लेकिन यह मानसिक गिरावट की गति को तेज नहीं करता।
इस बात को आसान शब्दों में कहें तो, अकेलापन दिमाग को थोड़ा सुस्त बना सकता है, पर यह उसे तेजी से बिगाड़ने या डिमेंशिया की ओर धकेलने की मुख्य वजह नहीं है।
क्या कहता है नया शोध?
एजिंग एंड मेंटल हेल्थ में प्रकाशित एक अध्ययन में करीब 10,000 यूरोपीय बुजुर्गों को शामिल किया गया। इन प्रतिभागियों की उम्र 65 से 94 वर्ष के बीच थी। यह शोध सर्वे ऑफ हेल्थ, एजिंग एंड रिटायरमेंट इन यूरोप के 2012 से 2019 तक के आंकड़ों पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने सात साल तक इन बुजुर्गों की मानसिक स्थिति और याददाश्त का बारीकी से विश्लेषण किया।
अध्ययन का सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जो लोग ज्यादा अकेलापन महसूस कर रहे थे, उनकी याददाश्त शोध की शुरुआत में अन्य लोगों की तुलना में कमजोर पाई गई। लेकिन, जैसे-जैसे समय बीता, तो तीसरे से सातवें साल के बीच, उनकी याददाश्त में गिरावट की रफ्तार वैसी ही सामान्य रही जैसी उन लोगों में थी जो सामाजिक रूप से सक्रिय थे और अकेलापन महसूस नहीं करते थे।
अकेलेपन का शिकार कौन?
शोध के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 92 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कम या सामान्य स्तर का अकेलापन महसूस किया। वहीं, 8 प्रतिशत लोग ऐसे थे जो गहरे अकेलेपन से जूझ रहे थे। इस समूह में कुछ खास समानताएं देखी गईं, जैसे- यह समूह उम्र में काफी बड़ा था, इनमें ज्यादातर महिलाएं शामिल थीं और वे पहले से ही खराब स्वास्थ्य, डिप्रेशन, हाई बीपी और डायबिटीज जैसी समस्याओं का सामना कर रहे थे।
याददाश्त पर असर
अध्ययन का रिजल्ट यह है कि अकेलापन और मानसिक गिरावट के बीच का संबंध उतना सीधा नहीं है जितना पहले समझा जाता था। शोध में देखा गया कि सात साल के समय के दौरान सभी समूहों में याददाश्त कम होने का पैटर्न लगभग एक जैसा ही रहा।
इसका मतलब यह है कि अकेलापन महसूस करने वाले व्यक्ति की याददाश्त का स्तर भले ही शुरुआत में थोड़ा कम हो, लेकिन समय के साथ उसकी मानसिक क्षमताएं अन्य बुजुर्गों की तुलना में ज्यादा तेजी से खत्म नहीं होतीं।
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