इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ के प्रमुख (सीआइएसस) एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने शुक्रवार को कहा कि भारतीय वायुसेना स्क्वाड्रन की कमी को लेकर चिंताओं से अवगत है, लेकिन वह अपनी युद्धक क्षमता को किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होने देगी।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वायुसेना मौजूदा लड़ाकू विमानों, प्रशिक्षण संसाधनों और मानव शक्ति का अधिकतम उपयोग कर रही है, ताकि किसी भी संभावित संघर्ष के दौरान वायु अभियानों पर असर न पड़े।
एएनआइ के राष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन में स्क्वाड्रन घटने को लेकर बढ़ती चिंता पर एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, “हम भी इस कमी को लेकर चिंतित हैं, लेकिन संसाधनों का सर्वोत्तम इस्तेमाल कर रहे हैं। हमने सिम्युलेटर बढ़ाए हैं, उड़ान घंटों को सुरक्षित कर रहे हैं और सोर्टी (छोटी उड़ानों) की संख्या भी बढ़ाई है। अब एक विमान दिन में छह सोर्टी तक लगा सकता है। मध्यम अवधि के युद्ध के लिए आवश्यक हवाई प्रयास को पूरा करने के लिए ये कदम उठाए गए हैं।” उन्होंने कहा कि वायुसेना का लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि “किसी भी परिस्थिति में युद्धक क्षमताओं में कमी न आए।”
ड्रोन खतरों पर उद्योग को सीमित छूट
एयर मार्शल दीक्षित से जब पूछा गया कि क्या औद्योगिक प्रतिष्ठान अपने स्तर पर सुरक्षा तंत्र स्थापित कर सकते हैं, तो उन्होंने बताया कि गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार देश के भीतर से उड़ने वाले छोटे ड्रोन के खिलाफ स्थानीय स्तर पर सुरक्षा व्यवस्था की अनुमति है। लेकिन सीमा-पार से आने वाले ड्रोन या हवाई खतरों से निपटना पूरी तरह वायुसेना की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि भविष्य के युद्धों का फैसला छोटे सिस्टम नहीं करेंगे। नुकसान पहुंचाने वाले ड्रोन से निपटने के लिए एंटी-ड्रोन सिस्टम जरूरी होंगे।
साइबर स्पेस युद्ध क्षमता में तेजी से आगे बढ़ रहा भारत
साइबर, स्पेस और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर जैसे आधुनिक युद्धक क्षेत्रों को “सीमाहीन डोमेन” बताते हुए सीआइएससी एयर मार्शल अशुतोष दीक्षित ने कहा कि इन क्षेत्रों में संभावनाएं असीमित हैं और भारत पिछले कुछ वर्षों में इन क्षमताओं को मजबूत करने की दिशा में निर्णायक कदम उठा चुका है।
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