अमेरिका और ईरान के बीच इस्लामाबाद में लगभग 21 घंटे तक चली मैराथन शांति वार्ता बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस (JD Vance) ने स्पष्ट किया कि वाशिंगटन ने अपना “सर्वश्रेष्ठ और अंतिम प्रस्ताव” दे दिया है, जबकि ईरान ने संकेत दिया है कि इस पर और चर्चा की आवश्यकता हो सकती है। इस विफलता ने दो सप्ताह के युद्धविराम (US-Iran Ceasefire) की मजबूती पर संदेह पैदा कर दिया है और वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल तेज कर दी है।
ऐसे में इसकी वजह से ग्लोबल मार्केट, कच्चे तेल और भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है चलिए समझते हैं।
क्या कच्चे तेल की कीमतें $100 के पार पहुंच जाएंगी?
बाजार के जानकारों का मानना है कि वार्ता विफल होने के बाद कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में तेजी से उछाल आना तय है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जहां से दुनिया के 20% तेल की आपूर्ति होती है, को लेकर अनिश्चितता एक बार फिर लौट आई है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने या आपूर्ति में और बाधा आने की स्थिति में कीमतों में 100 डॉलर से ज्यादा की भारी वृद्धि हो सकती है। युद्धविराम की घोषणा के बाद बाजार में जो सतर्क आशावाद बना था, वह अब खत्म होता दिख रहा है।
वैश्विक और भारतीय शेयर बाजारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
हालांकि तेल बाजारों में भारी उछाल की उम्मीद है, लेकिन इक्विटी (शेयर) बाजारों के लिए दृष्टिकोण थोड़ा अलग है। बाजार में उतार-चढ़ाव (Volatility) निश्चित रूप से देखने को मिलेगा, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल किसी भारी या निरंतर गिरावट (Sell-off) की संभावना कम है। स्थिति बदल रही है लेकिन बाजार को लगता है कि अमेरिका पर इस मुद्दे को सुलझाने का बहुत अधिक दबाव है। 3-5% की गिरावट आ सकती है, जिसका इस्तेमाल इक्विटी आवंटन बढ़ाने के लिए किया जाना चाहिए। हालांकि, निवेशकों को धीरे-धीरे निवेश करने की सलाह दी जाती है।
भारतीय बाजारों पर असर
नुकसान में रहने वाले सेक्टर में महंगे तेल का सीधा असर ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs), विमानन (Aviation) और पेंट कंपनियों के शेयरों पर पड़ेगा। वहीं फायदे में रहने वाले सेक्टर की बात करें तो अपस्ट्रीम तेल उत्पादक और ऊर्जा कंपनियों को इस उछाल से फायदा मिल सकता है।
लाइवलॉन्ग वेल्थ के शोध विश्लेषक हरिप्रसाद के ने कहा कि निफ्टी-50 इस समय एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। 24,000 अंक के स्तर को फिर से हासिल करने के बाद बाजार में सतर्क आशावाद दिख रहा था, लेकिन वार्ता विफल होने से निकट अवधि का परिदृश्य बदल गया है। उन्होंने कहा, ‘‘बिना किसी समाधान के वार्ता समाप्त होने से बाजार में फिर से उतार-चढ़ाव बढ़ने की आशंका है, जैसा संघर्ष के शुरुआती चरणों में देखा गया था।’’ उनके अनुसार, सोमवार को प्रमुख सूचकांक गिरावट के साथ खुल सकते हैं। इस सप्ताह बाजार पर मुद्रास्फीति के आंकड़ों, कंपनियों के चौथी तिमाही के नतीजों और विदेशी निवेशकों की गतिविधियों का भी असर रहेगा।
रेलिगेयर ब्रोकिंग के शोध प्रमुख अजित मिश्रा ने कहा कि विप्रो, एचडीएफसी बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसी प्रमुख कंपनियों के नतीजों पर निवेशकों की नजर रहेगी। इसके अलावा 13 अप्रैल को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) और 14 अप्रैल को थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आंकड़े भी जारी होंगे, जो महंगाई के रुझान का संकेत देंगे
महंगाई और रुपया पर क्या असर पड़ेगा?
कच्चे तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से घरेलू महंगाई दर पर असर पड़ सकता है, जिससे भारतीय रुपये (Rupee) में निकट अवधि में दबाव और अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
क्या भविष्य में कूटनीतिक समाधान की कोई उम्मीद बची है?
वार्ता के इस दौर के विफल होने का मतलब यह नहीं है कि कूटनीति के दरवाजे पूरी तरह बंद हो गए हैं, लेकिन इससे समाधान की समय सीमा जरूर बढ़ गई है। जब तक दोनों देशों के बीच स्पष्ट सहमति नहीं बन जाती, बाजार असमंजस की स्थिति में रहेगा। अमेरिका में भारत की पूर्व राजदूत, मीरा शंकर ने इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, “मुझे नहीं लगता कि किसी को भी वार्ता के एक ही दौर में समझौते की उम्मीद थी। ऐसा प्रतीत होता है कि यह आखिरी बातचीत नहीं होगी। चूंकि दोनों पक्षों ने स्पष्ट नहीं किया है कि वे भविष्य में इसे कैसे आ
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