राष्ट्रीय राजधानी की पारिस्थितिकीय रीढ़ मानी जाने वाली दिल्ली रिज में दोबारा से मूल जंगल वापस लाने की तैयारी है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून की बनाई गई योजना 2026-27 से 2036-37 को मंजूरी प्रदान करने के बाद इसे लागू करने की तैयारी है। वर्षों से फैली विदेशी और पर्यावरण के लिहाज से अनुपयुक्त मानी जाने वाली प्रजातियों की जगह अरावली क्षेत्र की मूल वनस्पतियों को फिर से स्थापित करने की तैयारी है।
रिज में अब पौधों की संख्या बढ़ाने से ज्यादा जोर उनकी प्रजातियां बदलने पर रहेगा। इसके पीछे मकसद सिर्फ हरियाली बढ़ाना नहीं, बल्कि राजधानी के सबसे बड़े प्राकृतिक वन क्षेत्र की बिगड़ी पारिस्थितिकी को फिर से संतुलित करना है। पूर्व निदेशक एफआरआई देहरादून डॉ. रेणु सिंह ने बताया कि 7,784 हेक्टेयर में फैली दिल्ली रिज स्थानीय जलवायु संतुलन, जैव विविधता, मृदा-जल संरक्षण और जलवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के नियमन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
केवल पौधरोपण से काम नहीं चलेगा, इसलिए इस योजना में पारिस्थितिकीय सिद्धांतों पर आधारित वैज्ञानिक प्रबंधन तय किया गया है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी जंगल की गुणवत्ता वहां खड़े पेड़ों की संख्या से नहीं, बल्कि उनकी प्रजातियों, उन पर निर्भर पक्षियों, तितलियों, कीटों और अन्य वन्यजीवों से तय होती है।
स्थानीय प्रजातियां स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ विकसित होती हैं, इसलिए वे जैव विविधता को बेहतर सहारा देती हैं। इसके विपरीत बाहरी प्रजातियां कई बार तेजी से फैलकर स्थानीय वनस्पतियों को पीछे छोड़ देती हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती हैं। केंद्रीय गृह मंत्री ने एक पेड़ मां के नाम अभियान के तहत मिशन 70 लाख पौधारोपण अभियान की शुरुआत करते हुए इसका जिक्र किया है।
आक्रामक प्रजातियों को हटाकर लगेंगे देशज पेड़
योजना में प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा, युकलिप्टुस और ल्यूकेना ल्यूकोसेफला को दिल्ली रिज की 3 प्रमुख आक्रामक प्रजातियों के रूप में चिह्नित किया गया है। ये प्रजातियां रिज की पारिस्थितिकीय संरचना को नुकसान पहुंचा रही हैं। योजना में चरणबद्ध तरीके से देशी प्रजातियां जैसे पीपल, बरगद, धौ, खैर, हिंगोट, बेर, अर्जुन, जामुन, नीम, शीशम और इमली जैसी प्रजातियों को लगाया जाना है।
5 स्तंभों पर आधारित है योजना
विविध वन विकास: अरावली रिज क्षेत्र में पीपल-बरगद ऊपरी छत्र बनाएंगे। धौ, खैर जैसी रिज प्रजातियां पारिस्थितिकीय तंत्र काे मजबूत बनाएंगी।
कार्बन पृथक्करण: पीपल, बरगद, अर्जुन, जामुन जैसी दीर्घजीवी प्रजातियां ज्यादा कार्बन स्टोर करेंगी और गर्मी-शुष्कता सहन करेंगी।
वायु प्रदूषण नियंत्रण: अधिक ऑक्सीजन देने वाले पीपल, बरगद, नीम, जामुन प्रजातियां कार्बन डाई ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसी गैसों को सोखेंगी और जलवायु प्रबंधन करेंगी।
पारिस्थितिकीय उत्तराधिकार: करी पत्ता, करोंडा, कुरची, कैर, निर्गुंडी, फाल्सा जैसी झाड़ियां मिट्टी स्थिर करेंगी और नए पौधों की रक्षा करेंगी।
पारिस्थितिकी तंत्र : हर प्रजाति का चुनाव उसकी पूरक सेवाओं के आधार पर किया गया है।
जल संरक्षण पर विशेष जोर
योजना में केवल पेड़ लगाना ही काफी नहीं माना गया है। इसके लिए ढलान वाली खाइयां, चेक डैम, वर्षा जल संचयन, नमी संरक्षण गड्ढे और मौजूदा जल निकायों के पुनर्जीवन का भी प्रावधान है। इसका उद्देश्य भूजल रिचार्ज बढ़ाना, मिट्टी का कटाव रोकना और सूखे-वनाग्नि के प्रति रिज की संवेदनशीलता कम करना है।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal