कंफर्ट इन, वाराणसी के एग्जीक्यूटिव शेफ रविकांत पाठक कहते हैं कि अगर आप मुझसे पूछें, तो कढ़ी भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे अंडररेटेड और सबसे शानदार डिश है। लेकिन इसे समझने के लिए आपको इसके उन तेल से लबालब और भारी मसालों वाले वर्जन को भूलना होगा जो अक्सर रेस्टोरेंट्स में परोसे जाते हैं।
असली कढ़ी-वो जो असली भारत के घरों में पकती है- संतुलन, तकनीक और दही की गुणवत्ता का एक अद्भुत मेल है। यह वह व्यंजन है जिसे किसी शाही फरमान ने नहीं, बल्कि आम भारतीय गृहिणी की किफायत ने जन्म दिया है।
अभाव से उपजा आविष्कार
कढ़ी का इतिहास दरअसल भारतीय रसोई के उस नियम पर टिका है जहां कुछ भी बर्बाद नहीं किया जाता। फ्रिज के दौर से बहुत-बहुत पहले, जब दूध खट्टा हो जाता था, तो भारतीय मेधा ने उस खट्टेपन को बेसन के साथ मिलाकर एक मखमली ग्रेवी में बदल दिया। इस लिहाज से देखें तो यह भारत का मूल अपसाइकिल फूड है। कढ़ी हमें सिखाती है कि सादगी ही असल में सबसे बड़ा हुनर है।
यह सिर्फ पेट नहीं भरती, यह उस भारत की कहानी कहती है जिसने अभावों के बीच भी दुनिया के सबसे अमीर स्वाद को जन्म दिया। इसकी जड़ें राजस्थान और गुजरात के उन शुष्क इलाकों में हैं जहां पानी और हरी सब्जियों का अकाल था।
जब जमीन से कुछ नहीं उगता था, तब पशुओं से मिले दूध का दही और बोरियों में भरा बेसन ही जीवन का आधार बना। मारवाड़ी कढ़ी का वो तीखा लहसुन और सूखी लाल मिर्च का तड़का दरअसल उस बंजर जमीन की सादगी की ताकत है।
क्षेत्रीय विविधता और वर्ग भेद
पंजाब में कढ़ी बनने का मतलब है ‘कढ़ना’। वहां कढ़ी तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक वह घंटों धीमी आंच पर पककर गाढ़ी न हो जाए। और पकौड़े? वे तो कढ़ी के दिल की धड़कन हैं। उत्तर प्रदेश में यह काम बेसन की स्वादिष्ट फुलौरी करती हैं। बात करें गुजरात की तो यहां कढ़ी एक पतली, दूधिया और खट्टी-मीठी डिश बन जाती है, जो भारी थाली के बीच पैलेट क्लींजर का काम करती है।
मगर सिंधी कढ़ी का इतिहास सबसे दिलचस्प है। यह विभाजन के बाद विस्थापित हुए समुदाय की जिजीविषा का प्रतीक है। इसमें दही नहीं, इमली का उपयोग होता है, जो वाकई इसे माइग्रेंट फूड की श्रेणी में रखता है-एक ऐसी डिश जो रास्ते में मिलने वाली किसी भी सब्जी को अपने भीतर समेट लेने के लिए तैयार थी।
रसोई से फाइन डाइनिंग तक
एक लंबे समय तक कढ़ी को घर का मामूली खाना मानकर दरकिनार किया गया। यह उत्तर भारत में बच्चे के जन्म के छठे दिन होने वाले उत्सव, यहां तक कि जन्माष्टमी पर मंदिरों में छठी उत्सव का भी अंग थी मगर इसे उन होटलों के मेन्यू में जगह नहीं मिली जहां तथाकथित मुगलई खाने का बोलबाला था।
लेकिन जब बीसवीं शताब्दी के आठवें दशक में हमने अपनी क्षेत्रीय जड़ों को खोजना शुरू किया, तब कढ़ी ने अपनी असली पहचान पाई। आज कढ़ी-चावल हम देसी लोगों का कंफर्ट फूड है, तो वहीं कढ़ी के रेडी टु ईट पैक विदेश में निर्यात हो रहे हैं। यहां पर ध्यान रहे, कि हमारी कढ़ी ब्रिटिशों द्वारा करी नाम से पुकारे जाने वाले रसेदार भारतीय व्यंजनों से बिल्कुल अलग है।
आज जब आप किसी लक्जरी होटल में सलीके से तड़का लगी गुजराती कढ़ी पीते हैं, तो आपको अहसास होता है कि इसका मखमली टेक्सचर किसी भी विदेशी सूप या भारी क्रीम वाली ग्रेवी से कहीं बेहतर है!
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