एक समय था जब यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएशन सेरेमनी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का नाम लेने पर तालियां गूंजती थीं, लोगों में उत्सुकता और उत्साह दिखता था। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। रविवार को एरिजोना यूनिवर्सिटी में गूगल के पूर्व सीईओ एरिक श्मिट जब मुख्य भाषण दे रहे थे, तो जैसे ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जिक्र किया, छात्रों ने जमकर हूटिंग और विरोध शुरू कर दिया।
एरिक श्मिट जब ग्रेजुएट को संबोधित करते हुए आधुनिक तकनीक, ऑटोमेशन और समाज पर एआई के प्रभाव की बात कर रहे थे, तो छात्रों ने बार-बार उनके भाषण में बाधा डाली। इस घटना के वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।
क्यों है एआई को लेकर गुस्सा?
विरोध करने वाले वे छात्र थे जो एक एआई-फर्स्ट दुनिया में कदम रखने जा रहे हैं। यह वह पीढ़ी है जो चैटजीपीटी, इंस्टाग्राम, टिकटॉक एल्गोरिदम और कई एआई टूल्स के साथ बड़ी हुई है। उम्मीद यह थी कि यह पीढ़ी सबसे ज्यादा एआई समर्थक होगी, लेकिन इसके उलट समारोह के भीतर का माहौल पूरी तरह से चिंता और तिरस्कार से भरा हुआ था।
आज के युवा कर्मचारी और छात्र अब एआई को एक कूल प्रोडक्टिविटी टूल के रूप में नहीं, बल्कि शुरुआती स्तर की नौकरियों, रचनात्मक कार्यों और अपने दीर्घकालिक करियर के लिए एक सीधे खतरे के रूप में देख रहे हैं। मीडिया, डिजाइन, सॉफ्टवेयर से लेकर कस्टमर सपोर्ट तक, हर उद्योग में यह तनाव पिछले कई महीनों से लगातार बढ़ रहा है।
कहीं नौकरी खोने का डर, तो कहीं काम आसान होने की खुशी
द कटिंग एज ग्रुप के संस्थापक और एआई शिक्षक अंश मेहरा का मानना है कि एआई के खिलाफ यह गुस्सा इंसानी मनोविज्ञान से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि आम तौर पर लोग लॉस एवर्स होते हैं, जिसका मतलब है कि वे किसी भी नुकसान से बचने के लिए कुछ भी करेंगे, भले ही उन्हें आगे चलकर ज्यादा फायदा होने की उम्मीद हो।
हमारे लिए नौकरी खोने का डर, काम के ऑटोमेशन से मिलने वाली खुशी से कहीं ज्यादा मजबूत है। यही वजह है कि हर कोई एआई को लेकर डरा हुआ है।
अंश मेहरा के अनुसार, यही कारण है कि टेक कंपनियों द्वारा एआई का आक्रामक प्रचार अब उत्साह के बजाय लोगों में बेचैनी पैदा कर रहा है। अब एआई से जुड़े किसी भी बड़े विमर्श को एक अपग्रेड के रूप में नहीं, बल्कि एक खतरे के रूप में देखा जा रहा है।
नौकरियों के अलावा, छात्र एआई की रचनात्मक सीमाओं पर भी भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा भुवि शर्मा कहती हैं कि मेरा मानना है कि एआई केवल वही दोहरा सकता है जो उसके सिस्टम में फीड किया गया है। यह नए विचारों का आविष्कार या निर्माण नहीं कर सकता। यह आउट ऑफ द बॉक्स नहीं सोच सकता।
अन्य विश्वविद्यालयों में भी दिखा विरोध
दिलचस्प बात यह है कि इस दीक्षांत सत्र में इस तरह के विरोध का सामना करने वाले एरिक श्मिट अकेले वक्ता नहीं हैं। इससे कुछ ही दिन पहले, यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट्रल फ्लोरिडा में भी छात्रों ने एक मुख्य वक्ता की तब हूटिंग की थी, जब उन्होंने एआई को अगली औद्योगिक क्रांति करार दिया था।
क्राइस्ट यूनिवर्सिटी की छात्रा लक्षिता गजेंद्र बाबू का मानना है कि भविष्य में केवल वही हुनर काम आएंगे जिन्हें मशीनें नहीं सीख सकतीं। उन्होंने कहा कि हर वह चीज जो विशिष्ट रूप से मानवीय है और जिसे रोबोट पूरी तरह से कॉपी नहीं कर सकता, वही आगे टिकेगी।
बयानबाजी का विरोध
हालांकि, अर्थशास्त्री और प्रोफेसर अभिरूप सरकार का कहना है कि एआई को रोकना अब असंभव है। कंपनियां बुनियादी ढांचे में अरबों का निवेश कर रही हैं, सरकारें नीतियां बना रही हैं और टेक लीडर्स इसे इस सदी की सबसे बड़ी तकनीक बता रहे हैं। लेकिन अनिवार्य होने का मतलब यह नहीं है कि लोग इस पर भरोसा भी करते हों।
बेंगलुरु के क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के लिबरल आर्ट्स विभाग की प्रमुख डॉ. प्रेरणा श्रीमाल के अनुसार,”एरिक श्मिट का विरोध देखकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। छात्र एआई के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का विरोध कर रहे हैं कि जिस तरह इस बदलाव के दौर में उनके भविष्य को बहुत हल्के में दांव पर लगाया जा रहा है।”
खुद श्मिट ने भी अपने भाषण में इस चिंता को स्वीकार किया। उन्होंने माना कि उनकी पीढ़ी ने जो डिजिटल सिस्टम बनाया, वह उम्मीद से कहीं ज्यादा जटिल साबित हुआ।
श्मिट ने छात्रों से कहा, “आपकी पीढ़ी में एक डर है कि भविष्य पहले ही लिखा जा चुका है, मशीनें आ रही हैं, नौकरियां खत्म हो रही हैं, और आप एक ऐसी अव्यवस्था को संभाल रहे हैं जिसे आपने पैदा नहीं किया। मैं आपके इस डर को समझता हूं।”
छात्रों द्वारा किया गया यह विरोध इसलिए मायने रखता है क्योंकि वे तकनीक को खारिज नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे अब सिलिकॉन वैली के झूठे उत्साह और वादों को बिना सोचे-समझे स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
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