दूसरे विश्व युद्ध के बाद से शांतिवादी छवि रखने वाला जापान अब अपनी रक्षा नीति में बड़ा बदलाव कर रहा है। लंबे समय तक हथियारों के निर्यात पर लगी पाबंदियों को हटाकर अब वह वैश्विक हथियार बाजार में उतरने की तैयारी में है।
जापान की सरकार नियमों में ढील देकर सैन्य उपकरण और हथियार बेचने का रास्ता आसान करना चाहती है। इससे जापान अब एक बड़े डिफेंस सप्लायर के रूप में उभर सकता है। यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब दुनिया में युद्ध और तनाव बढ़ने के कारण हथियारों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
वैश्विक हालात से मिला मौका
रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में तनाव के चलते हथियारों की सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। अमेरिका के पास पहले से ही बड़ी संख्या में ऑर्डर लंबित हैं, जिससे अन्य देश नए विकल्प तलाश रहे हैं।
इसी कारण कई देश अब जापान की ओर देख रहे हैं, ताकि उन्हें समय पर हथियार और रक्षा उपकरण मिल सकें। जापान भी इस मौके को भुनाकर खुद को एक भरोसेमंद सप्लायर के रूप में स्थापित करना चाहता है।
चीन की बढ़ी चिंता
जापान की इस नई नीति से चीन की चिंता बढ़ गई है। चीन ने जापान को चेतावनी देते हुए कहा है कि उसे इस मामले में सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इससे क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित हो सकता है।
वहीं, यूक्रेन इस बदलाव को एक अवसर के रूप में देख रहा है। दोनों देशों के बीच ड्रोन तकनीक और नई रक्षा प्रणालियों के विकास पर सहयोग की योजना बन रही है। जापान का लक्ष्य अमेरिका पर निर्भरता कम करते हुए अपनी अलग रक्षा सप्लाई चेन तैयार करना है।
जापान का रक्षा बजट अब करीब 60 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। देश की कंपनियां अब वैश्विक स्तर पर काम करने के लिए खुद को तैयार कर रही हैं। तोशिबा जैसी कंपनियां नए कर्मचारियों की भर्ती कर रही हैं और निर्यात के लिए अलग विभाग बना रही हैं। मित्सुबिशी इलेक्ट्रिक भी एशिया, यूरोप और अमेरिका में अपने काम को बढ़ा रही है और नई साझेदारियों पर ध्यान दे रही है।
फिलीपींस से पोलैंड तक बढ़ता दायरा
जापान अब अपने हथियारों का निर्यात फिलीपींस से लेकर पोलैंड जैसे देशों तक बढ़ा रहा है। ये देश भी अमेरिका और यूरोप पर निर्भरता कम करना चाहते हैं। पोलैंड का मानना है कि जापान के साथ सहयोग से दोनों देश अपनी रक्षा जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर सकते हैं।
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