उत्तराखंड में पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन आफ उत्तराखंड लिमिटेड के प्रबंध निदेशक पद से गैर तकनीकी पृष्ठभूमि के प्रकाश चंद्र ध्यानी को कार्यमुक्त करने का मुद्दा गर्म है। ध्यानी को हटाने के कई सियासी मायने भी तलाशे जा रहे हैं, लेकिन यह मामला सिर्फ पीसी ध्यानी तक सीमित नहीं बल्कि देश भर के ऊर्जा निगमों में शीर्ष पदों को लेकर छिड़ी टेक्नोक्रेट बनाम ब्यूरोक्रेट की जंग का एक हिस्सा है।
उत्तराखंड, पंजाब, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों के ऊर्जा निगमों में यह टकराव चल रहा है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या राज्य सरकारें पारदर्शी और स्पष्ट चयन प्रक्रिया अपनाकर इस बहस को समाधान तक पहुंचाएंगी, या तकनीकी बनाम प्रशासनिक गुटबाजी का यह स्वर और तीखा होता जाएगा।
ध्यानी का विवाद तो थमा, लेकिन टकराव नहीं टला
उत्तराखंड में पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन लिमिटेड के प्रबंध निदेशक पीसी ध्यानी की पात्रता पर सवाल उठा तो शासन को व्यवस्था में बदलाव करना पड़ा। कार्यमुक्त होने से पीसी ध्यानी का विवाद तो थम गया है, लेकिन यह टकराव समाप्त नहीं हुआ है।
इंजीनियर संगठनों का कहना है कि ग्रिड संचालन, ट्रांसमिशन नेटवर्क और सिस्टम संचालन तकनीकी विषय है। इसलिए शीर्ष पद पर तकनीकी पृष्ठभूमि अनिवार्य होनी चाहिए, जबकि राज्य सरकार का तर्क है कि प्रशासनिक अनुभव को नजरंदाज नहीं कर सकते। नियमों के तहत प्रशासनिक व्यक्ति को अस्थाई प्रभार दिया जा सकता है।
कई राज्यों में नेतृत्व को लेकर आमने-सामने
यह विवाद उत्तराखंड तक सीमित नहीं। पंजाब स्टेट पावर कारपोरेशन लि. और पंजाब स्टेट ट्रांसमिशन कारपोरेशन लि. में भी तकनीकी पृष्ठभूमि वाले एमडी को नियुक्त करने की मांग इंजीनियर संगठनों ने सीएम से की है। वहां के इंजीनियर्स का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने से तकनीकी निर्णय प्रभावित हो सकते हैं।
उत्तर प्रदेश में पावर ट्रांसमिशन कारपोरेशन लि. में समय-समय पर तकनीकी बनाम प्रशासनिक नेतृत्व को लेकर असंतोष सामने आता है। राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण निगम लि. में तकनीकी नेतृत्व की परंपरा बनाए रखने की मांग कर्मचारी संगठन उठा रहे हैं। मध्य प्रदेश पावर ट्रांसमिशन कंपनी में भी तकनीकी बनाम प्रशासनिक धड़े के बीच नेतृत्व को लेकर विवाद पुराना है।
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