हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के बाद पीछे मुड़कर देखना मना है। जानिए इसके पीछे के धार्मिक, वैज्ञानिक और पौराणिक कारण और गरुड़ पुराण क्या कहता है। शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, श्मशान घाट नकारात्मक ऊर्जाओं और अतृप्त आत्माओं का केंद्र माना जाता है।
हिंदू धर्म में मृत्यु के बाद सोलह संस्कारों में से अंतिम, यानी ‘अंत्येष्टि संस्कार’ को लेकर कई कड़े नियम और परंपराएं बनाई गई हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा है- दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर न देखना। अक्सर श्मशान से लौटते समय बड़े-बुजुर्ग हिदायत देते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए, पीछे पलटकर मत देखना।
आइए जानते हैं इसके पीछे के धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और पौराणिक कारण:
धार्मिक और आध्यात्मिक कारण (Garuda Purana)
गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के अनुसार, जब शरीर का दाह संस्कार किया जाता है, तो आत्मा को मोह भंग होने में समय लगता है। कहा जाता है कि शरीर जलने के बाद भी आत्मा अपने परिजनों के आसपास मंडराती रहती है और उन्हें पुकारती है।
मोह का बंधन: अगर परिजन पीछे मुड़कर देखते हैं, तो आत्मा को लगता है कि परिवार का मोह अभी भी बना हुआ है। इससे आत्मा को परलोक की यात्रा शुरू करने में बाधा आती है। वह वापस मोह के बंधन में बंध सकती है। पीछे न देखना इस बात का प्रतीक है कि अब मृत व्यक्ति का इस संसार से नाता टूट चुका है।
मनोवैज्ञानिक कारण (Psychological Reason)
मृत्यु एक गहरा आघात होती है। दाह संस्कार के बाद पीछे मुड़कर देखना व्यक्ति की भावनाओं को और कमजोर बना सकता है।
भावनात्मक दृढ़ता: पीछे मुड़कर देखने से व्यक्ति के मन में मृतक की स्मृतियां और उसकी जलती हुई चिता का दृश्य फिर से ताजा हो सकता है, जिससे दुख से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। यह नियम व्यक्ति को ‘आगे बढ़ने’ (Move on) का संदेश देता है।
नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव
शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, श्मशान घाट नकारात्मक ऊर्जाओं और अतृप्त आत्माओं का केंद्र माना जाता है।
सुरक्षा का भाव: ऐसी मान्यता है कि अगर कोई पीछे मुड़कर देखता है, तो नकारात्मक शक्तियां उस व्यक्ति की कमजोरी को भांप लेती हैं और उसके प्रति आकर्षित हो सकती हैं। सीधा आगे बढ़ना आत्मिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का एक तरीका माना गया है।
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