महाभारत युद्ध का वो पल, जब एक महादानी के अंत पर छलके थे माधव के आंसू

महाभारत का युद्ध केवल एक संग्राम नहीं था, बल्कि वह धर्म की जीत का प्रतीक था। इस युद्ध में कई महान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन महारथी कर्ण का अंत एक ऐसी घटना थी, जिसने खुद जगत के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण को भी झकझोर कर रख दिया था। कर्ण महाभारत कथा के उन पात्रों में से एक थे जिनकी वीरता और दानवीर होने की कथा आज भी लोगों को सुनाई जाती है, आइए महाभारत युद्ध के उस पल के बारे में जानते हैं जब एक महादानी के अंत पर भगवान कृष्ण के आंसू छलके थे।

कर्ण की हार
महाभारत कथा के अनुसार, कर्ण का अंत तब हुआ जब वह असहाय थे, उनका रथ धरती में धंसा था और वह शस्त्रहीन थे। अर्जुन के बाण ने जब कर्ण का शीश काटा, तो पांडव की ओर विजय का शंखनाद हुआ, लेकिन श्रीकृष्ण के मुख पर जरा सी भी मुस्कान नहीं थी। कृष्ण जानते थे कि जिस योद्धा को उन्होंने छल और नीति से हराया, वह खुद धर्म का साक्षात स्वरूप था।

कृष्ण की पीड़ा यह थी कि उन्हें एक ऐसे व्यक्ति की मृत्यु की योजना बनानी पड़ी, जिसने अपना पूरा जीवन केवल त्याग और अपमान में बिताया। वहीं, जब कर्ण मृत्युशैया पर थे, तब भगवान कृष्ण ने उनकी दानवीरता की अंतिम परीक्षा ली। कर्ण ने अपने रक्त से सने सोने के दांत को तोड़कर ब्राह्मण बने कृष्ण जी को दान कर दिया। उस पल माधव की आंखें आंसुओं से भर गई। उन्होंने स्वीकार किया कि दानवीरता के मामले में वे खुद भी कर्ण से पीछे हैं।

माधव की अनकही व्यथा
कर्ण के वध के बाद जब श्री कृष्ण अर्जुन के साथ शिविर की ओर लौट रहे थे, तो वे बहुत शांत थे।
कृष्ण भगवान जानते थे कि कर्ण कुंती के बड़े पुत्र थे। उन्हें दुख था कि पांचों पांडवों को उनके बड़े भाई के खिलाफ खड़ा करना पड़ा।
कर्ण ने दुर्योधन के प्रति अपनी मित्रता का धर्म मरते दम तक निभाया। श्रीकृष्ण जानते थे कि कर्ण जैसा मित्र मिलना मुश्किल है।
सम्राट बनाने के वचन के बाद भी कर्ण ने अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी।

जब कृष्ण हुए थे भावुक
जब अर्जुन ने विजय के बाद पूछा कि माधव आप इतने दुखी क्यों हैं? तब कृष्ण ने भारी मन से कहा – ” पार्थ आज युद्ध केवल एक योद्धा ने नहीं हारा, बल्कि इस संसार ने अपना सबसे बड़ा दानी खो दिया है। कर्ण का शरीर भले ही अधर्म की ओर था, लेकिन उसका चरित्र गंगा की तरह पवित्र था।”

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