एक ताजा शोध में सामने आया है कि यह बीमारी दिमाग पर भी गहरा असर डाल सकती है और डिमेंशिया जैसे गंभीर रोग का खतरा कई गुना तक बढ़ा सकती है। टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित लोगों में डिमेंशिया का जोखिम सामान्य लोगों के मुकाबले लगभग तीन गुना तक पाया गया है।
वहीं, टाइप-2 डायबिटीज में यह खतरा करीब दोगुना है। यह अध्ययन अमेरिकन एकेडमी आफ न्यूरोलाजी के जर्नल न्यूरोलाजी जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसने इस खतरे को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है।
डायबिटीज बढ़ा सकती है दिमागी मुश्किलें
करीब 2.8 लाख लोगों पर किए गए इस शोध में साफ दिखा कि डायबिटीज से जूझ रहे लोगों में डिमेंशिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। शोधकर्ता जेनिफर वीव के मुताबिक, आधुनिक इलाज के चलते टाइप-1 डायबिटीज के मरीज अब लंबा जीवन जी रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही मस्तिष्क पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव भी सामने आ रहे हैं खासतौर पर 65 वर्ष से अधिक उम्र में।
टाइप-1 डायबिटीज को हल्के में लेना पड़ेगा भारी
हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह सीधा कारण- परिणाम संबंध नहीं है, बल्कि एक मजबूत कड़ी है। यानी डायबिटीज सीधे डिमेंशिया का कारण साबित नहीं हुई, लेकिन दोनों के बीच गहरा जुड़ाव जरूर पाया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक ब्लड शुगर का असंतुलन, नसों को नुकसान और मस्तिष्क में रक्त प्रवाह की कमी जैसे कारण इस जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
यानी टाइप-1 डायबिटीज को हल्के में लेना अब खतरनाक हो सकता है। समय रहते नियंत्रण, नियमित जांच और संतुलित जीवनशैली अपनाकर इस बढ़ते खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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