चीन से सस्ते स्टील की डंपिंग बेलगाम: 367 प्रतिशत तक बढ़ा आयात

चीन से होने वाली भारत में स्टील की डंपिंग थमने का नाम नहीं ले रही। यूक्रेन-रूस और पश्चिम एशिया के संघर्षों से पैदा हुई वैश्विक अस्थिरता से यह डंपिंग और बढ़ती नजर आ रही है। अतिरिक्त क्षमता और घरेलू मांग में कमी के चलते चीन की स्टील कंपनियां भारत जैसे बाजारों में कम गुणवत्ता वाले स्टेनलेस स्टील की डंपिंग बढ़ा रही हैं। इससे भारतीय स्टील उद्योग की परेशानी बढ़ती जा रही है और साथ ही निम्न गुणवत्ता की स्टील सामग्री के इस्तेमाल से स्वास्थ्य-सुरक्षा का जोखिम पैदा होने का भी खतरा बढ़ रहा है। उद्योग जगत ने सरकार को इस समस्या की गंभीरता से अवगत कराया है, लेकिन सरकार के कदम नाकाफी साबित हो रहे हैं।

2026 में चीन से स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों का आयात 53,271 मीट्रिक टन

सरकारी आंकड़ों में जुलाई 2026 में चीन से स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों का आयात 53,271 मीट्रिक टन रहा, जो वित्त वर्ष 2026 के औसत मासिक आयात 18,576 मीट्रिक टन का करीब 2.9 गुना है। जून-जुलाई 2025 से जून-जुलाई 2026 तक वृद्धि 197 प्रतिशत रही। सितंबर 2026 में चीन से भारत को निर्यात 65,000 टन रहा, जो वर्ष-दर-वर्ष 367 प्रतिशत अधिक था। मुख्य स्रोत चीन है, लेकिन इंडोनेशिया, वियतनाम और दक्षिण कोरिया से भी आयात हो रहा है। उद्योग सूत्रों का कहना है कि इन देशों से भी चीन की कंपनियों का ही स्टील भारत में आ रहा है। उल्लेखनीय बात यह है कि सरकार एक तरफ डंपिंग रोकने की बात करती है लेकिन उसके कुछ नियम इसको बढ़ावा देने जैसे हैं। जैसे 27 अप्रैल, 2026 के आदेश के मुताबिक स्टेनलेस स्टील फ्लैट उत्पादों पर गुणवत्ता संबंधी नियंत्रण आदेश को निलंबित करने का फैसला। यह फैसला वैसे तो छोटे, मझोले उद्योगों की सहूलियत के लिए हुआ ताकि उन पर अनुपालन बोझ कम हो और कच्चा माल आसानी से उपलब्ध हो। बाद में जून 2026 के संशोधन में स्टील उद्योग से जुड़े कुछ प्रमुख मानकों को लागू करने का एक अन्य आदेश को मार्च 31, 2027 तक स्थगित कर दिया गया। इस राहत का मकसद घरेलू आपूर्ति को आसान बनाना था, लेकिन इसके तुरंत बाद सस्ते और गैर-मानकीकृत स्टील का आयात तेजी से बढ़ा है। भारत सरकार की एजेंसियां (डीजीटीआर) चीन, इंडोनेशिया और वियतनाम से स्टेनलेस स्टील पर एंटी-डंपिंग जांच कर रही है, लेकिन अभी तक कोई शुल्क नहीं लगाया गया है। जिंदल स्टेनलेस के सीईओ और पूर्ण कालिक निदेशक तरुण कुमार खुल्बे ने दैनिक जागरण को बताया कि स्टेनलेस स्टील का उपयोग स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्रों में होता है। इससे बर्तन बनते हैं, इसका उपयोग परमाणु, ऊर्जा, फार्मा और यातायात जैसे विभिन्न औद्योगिक एवं व्यक्तिगत क्षेत्रों में होता है। ये ऐसे अनुप्रयोग हैं जहां गुणवत्ता का होना बेहद जरूरी है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा समबन्धित मामलों पर असर

लेकिन भारत में गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (क्यूओसी) को मार्च 2027 तक निलंबित किए जाने के कारण, कई व्यापारी गुणवत्ता के बजाय कीमत को प्राथमिकता देते हुए सस्ता माल खरीदते हैं और उसका उपयोग इन अनुप्रयोगों में भी करते हैं। इसका सीधा असर कई बार स्वास्थ्य और सुरक्षा समबन्धित मामलों पर तुरंत दिखाई देता है, लेकिन आमतौर पर ये प्रतिकूल परिणाम लंबे समय के बाद ही प्रत्यक्ष होते हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अगर हम वैश्विक स्तर पर देखें कि कम गुणवत्ता वाली सामग्री कहां से आ रही है, तो चीन इसके लिए जाना जाता है। यह सिर्फ स्टेनलेस स्टील की बात नहीं है, बल्कि कई दूसरे उत्पादों में भी ऐसा देखने को मिलता है। चीन में हर तरह की गुणवत्ता का माल बनता है, लेकिन जब डंपिंग की बात आती है, तो सस्ता माल भारतीय बाारों में भेजा जाता है।” ”भारत में बहुत से लोग सस्ता बिना गुणवत्ता वाले सामान खरीदने को प्राथमिकता देते हैं। हमारे देश में अभी भी इस बात को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है कि कम गुणवत्ता की सामग्री के उपयोग के दुष्प्रभाव क्या क्या हो सकते हैं।” उद्योग जगत की तरफ से बार बार सरकार को इस बारे में चेताया जा रहा है। जून 2026 में स्टील मंत्रालय को पत्र लिखकर क्यूसीओ की बहाली की मांग की। पत्र में कहा गया कि क्यूसीओ के निलंबन ने चीन से सस्ते आयात का द्वार खोल दिया है और हजारों नौकरियां व निवेश खतरे में हैं।

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