कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने के बाद हर मरीज एक स्वस्थ जीवन की उम्मीद करता है, लेकिन जापान में किए गए एक हालिया अध्ययन ने एक नई चिंता को जन्म दिया है। मशहूर मेडिकल पत्रिका ‘कैंसर’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि कैंसर का इलाज करने वाली कुछ थेरेपीज, भविष्य में ब्लड से जुड़े कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकती हैं।
क्या है यह नई समस्या?
इस अध्ययन में बताया गया है कि हाल के वर्षों में जापान के अंदर ‘थेरेपी संबंधित तीव्र मायलोइड ल्यूकेमिया’ (tAML) के मामलों में धीरे-धीरे वृद्धि देखी गई है। यह खतरा विशेष तौर पर उन मरीजों में ज्यादा देखा जा रहा है जिनका पहले स्तन कैंसर का इलाज हो चुका है।
tAML असल में खून और बोन मैरो का एक बहुत ही आक्रामक कैंसर है। यह बीमारी आमतौर पर तब पनपती है जब कोई मरीज कैंसर से ठीक होने के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन थेरेपी से गुजरता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन कड़े उपचारों की वजह से मरीज के डीएनए को जो नुकसान पहुंचता है, संभवतः वही इस नए ब्लड कैंसर का मुख्य कारण है।
ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के चौंकाने वाले आंकड़े
यह समझने के लिए कि क्या कैंसर से ठीक होने वाले लोगों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ यह नई बीमारी भी बढ़ रही है, शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया। उन्होंने ओसाका कैंसर रजिस्ट्री के डेटा का गहराई से विश्लेषण किया, जिसमें साल 1990 से 2020 के बीच ‘तीव्र माइलायड ल्यूकेमिया’ (AML) के शिकार हुए मरीजों की जांच की गई।
इस जांच में सामने आए मुख्य तथ्य इस प्रकार हैं:
कुल मामले: जांचे गए 9,841 AML मरीजों में से 636 मरीजों (यानी 6.5 प्रतिशत) में tAML पाया गया।
तेजी से बढ़ती दर: साल 1990 में, प्रति 100,000 की जनसंख्या पर tAML की वार्षिक घटना दर मात्र 0.13 थी।
वर्तमान स्थिति: साल 2020 तक यह दर काफी हद तक बढ़ गई और प्रति 100,000 की जनसंख्या पर 0.36 तक पहुंच गई।
दोगुना हुआ खतरा
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कुल AML मामलों के बीच, थेरेपी से होने वाले इस नए कैंसर का अनुपात अब दोगुना हो गया है। यह डेटा इस बात की ओर इशारा करता है कि कैंसर के इलाज के बाद भी मरीजों के स्वास्थ्य की लगातार निगरानी करना बेहद जरूरी है।
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