एम्स और राजीव गांधी कैंसर संस्थान द्वारा किए गए इस अध्ययन में 5,419 बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया गया।
‘कैंसर’ महज एक शब्द नहीं है, बल्कि एक ऐसा डर है जो किसी भी परिवार को अंदर तक झकझोर देता है। ऐसे में जब कोई बच्चा इस गंभीर बीमारी को मात देकर ‘कैंसर-फ्री’ होता है, तो वह पूरे परिवार के लिए एक नई जिंदगी की सुखद शुरुआत होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इलाज पूरी तरह खत्म होने के बाद इन बच्चों का जीवन कैसा होता है? भारत में अब तक इस विषय पर बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध थी।
कैंसर को हराकर सामान्य जीवन जी रहे 94.5% बच्चे
अब एक बेहद राहत भरी और उत्साहजनक खबर सामने आई है। बचपन में कैंसर से उबर चुके बच्चों के स्वास्थ्य पर नज़र रखने वाली भारत की पहली राष्ट्रव्यापी रजिस्ट्री ने अपनी अहम रिपोर्ट जारी की है। इस अध्ययन के अनुसार, कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद बच्चों के जीवित रहने की दर 94.5 प्रतिशत पाई गई है। यह आंकड़ा उन माता-पिता के लिए एक बड़ी उम्मीद है, जिनके बच्चे इस कठिन समय से गुजर रहे हैं।
कैंसर के खिलाफ बड़ी जीत
यह महत्वपूर्ण अध्ययन नई दिल्ली के एम्स और राजीव गांधी कैंसर संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं की एक टीम ने किया है। इस टीम ने देश भर के 20 अलग-अलग केंद्रों से ऐसे 5,419 बच्चों के आंकड़ों का गहराई से अध्ययन किया, जिन्हें 18 साल की उम्र से पहले कैंसर हुआ था और वे इलाज के बाद पूरी तरह रोगमुक्त हो गए थे। जांच के दौरान इनमें से 5,140 बच्चों के जीवित रहने के स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध थे।
40% मामलों में ‘एक्यूट ल्यूकेमिया’ की पहचा
रिपोर्ट बताती है कि इन बच्चों में जो कैंसर सबसे आम पाया गया, वह ‘एक्यूट ल्यूकेमिया’ (40.9 प्रतिशत) था। अगर इलाज के तरीकों की बात करें, तो इन बच्चों में से 94.7 प्रतिशत मामलों में कीमोथेरेपी का उपयोग किया गया। इसके अलावा 30 प्रतिशत बच्चों में सर्जरी और 26.3 प्रतिशत मामलों में रेडियोथेरेपी का इस्तेमाल किया गया।
कैंसर को मात देने के बाद भी सतर्कता है जरूरी
जहां एक ओर पांच वर्ष से ज्यादा समय तक 94.5 प्रतिशत का सर्वाइवल रेट सुकून देता है, वहीं यह रिपोर्ट भविष्य के लिए एक चेतावनी भी देती है। अध्ययन में बताया गया है कि कैंसर को हराने वाले कई बच्चों को अपना इलाज पूरा करने के महीनों या सालों बाद भी कुछ स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, राहत की बात यह है कि प्राथमिक इलाज खत्म होने के बाद 89.9 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो इन जटिलताओं से पूरी तरह मुक्त और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
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