ईरान से आर-पार की जंग में अमेरिका, खाड़ी में US आर्मी को उतारा

मिडिल ईस्ट में बारूद की गंध अब और गहरी हो गई है। अमेरिका के ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ के चार हफ्ते पूरे होने के बाद भी खाड़ी क्षेत्र युद्ध के उस मुहाने पर खड़ा है, जैसा नजारा इराक युद्ध के बाद कभी नहीं देखा गया। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप तेहरान के साथ बातचीत का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ हजारों अमेरिकी सैनिकों का कारवां ईरान की घेराबंदी के लिए बढ़ रहा है।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, अब तक ईरान के 9,000 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया जा चुका है, जिसमें बैलिस्टिक मिसाइल यूनिट्स से लेकर रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) के मुख्यालय तक शामिल हैं।

तनाव की असली वजह ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ बनी हुई है। दुनिया के 20 फीसदी तेल व्यापार का रास्ता रोकने की ईरान की कोशिशों के जवाब में अमेरिका ने अब अपनी थल सेना और नौसेना की सबसे घातक टुकड़ियों को मोर्चे पर उतार दिया है।

पेंटागन के इस कदम ने साफ कर दिया है कि अमेरिका केवल हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर जमीनी कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा।

ट्रिपोली और बॉक्सर स्ट्राइक ग्रुप

खाड़ी की ओर बढ़ रही अमेरिकी कुमक में सबसे महत्वपूर्ण ‘ट्रिपोली एम्फीबियस रेडी ग्रुप’ है। इसमें अमेरिका का घातक युद्धपोत ‘यूएसएस ट्रिपोली’ और 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट (MEU) शामिल हैं। जापान के सासेबो से रवाना हुआ यह बेड़ा 23 मार्च तक डिएगो गार्सिया पहुंच चुका था और मार्च के अंत या अप्रैल की शुरुआत तक युद्ध क्षेत्र में तैनात हो जाएगा।

ट्रिपोली की खासियत यह है कि यह एक हल्के विमानवाहक पोत की तरह काम करता है, जो एफ-35बी (F-35B) जैसे आधुनिक जेट्स के साथ-साथ मरीन सैनिकों को समुद्र और हवा, दोनों रास्तों से उतारने में सक्षम है।

इसके ठीक पीछे कैलिफोर्निया से ‘यूएसएस बॉक्सर’ ग्रुप रवाना हुआ है। इसमें 11वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट के 2,200 सैनिक सवार हैं। हालांकि, सैन डिएगो से खाड़ी की 22,200 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे अप्रैल के मध्य तक का समय लगेगा, लेकिन इसकी रवानगी को तय समय से तीन हफ्ते पहले तेज कर दिया गया है।

11वीं मरीन यूनिट का खाड़ी में पुराना और आक्रामक इतिहास रहा है; इसने 1990 के खाड़ी युद्ध और 2004 के इराक अभियान में प्रमुख भूमिका निभाई थी।

आसमान से उतरेंगे फौजी

जमीनी मोर्चे को मजबूती देने के लिए पेंटागन ने अपनी सबसे विशिष्ट ‘इमीडिएट रिस्पांस फोर्स’ यानी 82nd एयरबोर्न डिवीजन के करीब 2,000 सैनिकों को मिडिल ईस्ट भेजने का आदेश दिया है।

नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग स्थित यह डिवीजन दुनिया की सबसे तेज तर्रार फोर्स मानी जाती है, जो आदेश मिलने के मात्र 18 घंटों के भीतर दुनिया के किसी भी कोने में पैराशूट के जरिए उतर सकती है। इनका मुख्य काम हवाई अड्डों पर कब्जा करना और बाद में आने वाली भारी सेना के लिए जमीन तैयार करना होता है।

इस डिवीजन का इतिहास दूसरे विश्व युद्ध के नॉर्मेंडी लैंडिंग से लेकर 2020 में कासिम सुलेमानी की मौत के बाद पैदा हुए तनाव तक फैला हुआ है। हालांकि इनके पास शुरुआत में भारी बख्तरबंद गाड़ियां नहीं होतीं, लेकिन दुश्मन के इलाके में घुसकर रणनीतिक ठिकानों को सुरक्षित करने में इनका कोई सानी नहीं है।

विदेश मंत्री मार्को रुबियो के उस बयान ने हलचल बढ़ा दी है जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका को ईरान के भीतर घुसकर परमाणु सामग्री को सुरक्षित करना पड़ सकता है।

7,000 अतिरिक्त सैनिकों का जत्था

वर्तमान में यूएसएस अब्राहम लिंकन स्ट्राइक ग्रुप पहले से ही युद्ध क्षेत्र में सक्रिय है। हालांकि यूएसएस जेराल्ड आर फोर्ड मरम्मत के लिए भूमध्य सागर में रुका हुआ है, लेकिन नए सैनिकों के आने से अमेरिकी सैन्य क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।

मरीन और एयरबोर्न सैनिकों को मिलाकर करीब 7,000 नए जवान इस मोर्चे पर जुड़ रहे हैं। यह कॉम्बिनेशन समुद्र से मरीन कमांडो और आसमान से पैराट्रूपर्स ईरान के खिलाफ ‘पिंसर मूवमेंट’ (दोतरफा घेराबंदी) बनाने की तैयारी की ओर इशारा कर रहा है।

ईरान ने भी पीछे हटने के संकेत नहीं दिए हैं। उसने खाड़ी देशों और अमेरिकी ठिकानों पर रोजाना ड्रोन और मिसाइल हमले जारी रखे हैं। 140 से ज्यादा ईरानी जहाजों के तबाह होने और तेल डिपो पर मंडराते खतरे के बावजूद तेहरान झुकने को तैयार नहीं है।

ऐसे में सवाल यह है कि क्या ये 7,000 सैनिक सिर्फ ‘बैकअप’ हैं या किसी बड़े जमीनी आक्रमण की शुरुआती लहर? आने वाले दो हफ्ते मिडिल ईस्ट के भविष्य के लिए निर्णायक साबित होने वाले हैं।

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