अमेरिका-ईरान और इजरायल के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटे चली मैराथन वार्ता बेनतीजा रही। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ईरान से रियायतें हासिल किए बिना लौट गए। दुनियाभर की नजर इस शांति समझौते पर टिकी हुई थी।
इस वार्ता को अमेरिका और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के रूप में पेश किया गया था, जिसने वैश्विक मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा था। जिन्ना कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस बैठक की भव्यता में तो कोई कमी नहीं रही।
पत्रकारों के लिए हाई-स्पीड इंटरनेट और बेहतरीन खाने-पीने की व्यवस्था थी, लेकिन वो असल चर्चा से काफी दूर थे। इस शानदार दिखावे के पीछे पारदर्शिता की कमी साफ झलक रही थी।
पाकिस्तान की खुली पोल
Firstpost की एक रिपोर्ट के अनुसार, पत्रकारों को मुख्य वार्ता स्थल से काफी दूर रखा गया, जिससे उन्हें जमीनी हकीकत जानने का कोई सीधा मौका नहीं मिला। कोई औपचारिक प्रेस ब्रीफिंग आयोजित नहीं की गई।
सूचनाओं का केवल चुनिंदा WhatsApp मसेजेस के जरिए भेजा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार एक पत्रकार ने बताया सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देकर मीडिया को दूर रखा गया, जबकि आयोजन को विश्व स्तर का बताया जा रहा था।
दिलचस्प बात यह रही कि मीडिया रूम में भी एक बंटवारा देखने को मिला, जहां अमेरिकी और ईरानी पत्रकार अलग-अलग ग्रुप में बैठे नजर आए।
कुल मिलाकर, कार्यक्रम की ब्रांडिंग तो वर्ल्ड लेवल की थी, लेकिन वास्तविक जानकारी की कमी के चलते पत्रकारों को घंटों इंतजार के बाद भी केवल निराशा ही हाथ लगी।
शांति समझौता फेल, क्या है आगे का खेल?
ईरान के साथ वार्ता फेल होने के बाद अब अमेरिका के सामने दो प्रमुख विकल्प हैं- पहला, ईरान के साथ लंबी और जटिल कूटनीतिक वार्ता जारी रखना, और दूसरा, उस सैन्य संघर्ष को फिर से शुरू करना जिसने पहले ही वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, दोनों विकल्पों में बड़े जोखिम हैं। युद्ध की स्थिति लौटने पर तेल आपूर्ति, गैस की कीमतों और वैश्विक बाजारों पर गंभीर असर पड़ सकता है, जबकि लंबी वार्ता राजनीतिक और रणनीतिक रूप से थकाऊ साबित हो सकती है।
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