तकनीक और एआइ ने पर्यटन की योजना और रिसर्च को तेज और आसान बना दिया है, लेकिन अंतिम बुकिंग और वित्तीय जोखिम के मामलों में इंसानी सजगता ही सबसे जरूरी है। एआइ रास्ते और लॉजिस्टिक्स तो सही बता सकता है, पर यात्रा के अनूठे एहसास और जमीनी हकीकत खुद ही जानें तो बेहतर..
तकनीक तेज हुई पर सिस्टम का तालमेल ठीक नहीं
हाल ही में जब मैंने स्काटलैंड, आयरलैंड और नार्वे में एक महीना बिताया, तो ट्रेन, फेरी, फ्लाइट, कार किराए पर लेने से लेकर एयरबीएनबी तक की सारी बुकिंग मेरे फोन पर कुछ ही मिनटों में हो गई। कुछ साल पहले तक इसके लिए ढेरों प्रिंटआउट निकालने पड़ते थे और दर्जनों फोन काल्स करने पड़ते थे, लेकिन तेज रफ्तार का मतलब यह नहीं कि सब कुछ बिना किसी रुकावट के हो जाए। मेरी एक फ्लाइट का स्टेटस भुगतान करने के कई दिनों बाद तक अंडर प्रोसेस ही दिखता रहा। यानी तकनीक तो तेज हुई है, लेकिन अलग-अलग सिस्टम्स के बीच का तालमेल अब भी उतना पक्का नहीं है।
आधुनिक यात्री का बदलता मिजाज
आज यात्रियों का रवैया पूरी तरह बदल चुका है। पहले लोग मुझसे पूछते थे- मुझे कहां जाना चाहिए? अब वे अपनी पूरी योजना (जो अक्सर एआइ ने बनाई होती है) लेकर आते हैं और पूछते हैं, क्या यह प्रैक्टिकल है? या मुझसे क्या छूट रहा है? जगहों की खोज अब रील्स और चैटबाट्स तक सिमट गई है। अब लोग मुझसे सिर्फ अनुभव और वास्तविकता जानना चाहते हैं-वहां का मौसम कैसा है, सड़कें कैसी हैं और ऐसी कौन सी बात है जो किसी गाइड-लिस्ट में नहीं मिलेगी।
अंतिम फैसला हो आपका
मैं यात्रा के दौरान तकनीक का इस्तेमाल करता हूं, लेकिन बहुत सोच-समझकर। यात्रा की रिसर्च के लिए एआइ बेहद कारगर साबित होता है-चाहे रूट प्लान करना हो, मौसम का सही समय देखना हो या यह तय करना हो कि एक दिन में कितना सफर व्यावहारिक है। इस यात्रा के दौरान मैंने अपनी सारी बुकिंग्स की जानकारी एक एआइ चैट में डाल दी थी, जो मेरी ट्रिप का मास्टरमाइंड बन गया।
इसने मेरी उन गलतियों को पकड़ लिया जो मुझसे छूट रही थीं-जैसे कि एक रात के लिए रहने का कोई इंतजाम ही नहीं था। बात तो सही थी, लेकिन बुकिंग जैसी जरूरी बातों के निर्णय मैं खुद ही करता हूं। एआइ मेरा गाइड है, मेरा एकमात्र सहारा नहीं।
दूर हुईं छोटी रुकावटें
सफर में छोटी-छोटी रुकावटें भी भारी पड़ती हैं, क्योंकि इससे फोटोग्राफी और शूटिंग का कीमती समय बर्बाद होता है। उदाहरण के लिए, इस बार मेरी पार्टनर और मैं अलग-अलग एयरलाइंस और अलग-अलग टर्मिनल्स से सफर कर रहे थे। अगर बुकिंग्स नान-रिफंडेबल हों, तो एक ट्रेन की देरी से आगे की तीन बुकिंग्स पर पानी फिर सकता है।
ऐसे में एआइ की मदद से आप अपनी पूरी योजना को दोबारा शेड्यूल कर सकते हैं। यानी एक ऐसा सिस्टम, जो सब कुछ खुद सिंक कर ले और एक भी चीज बदलने पर पूरी योजना को अपने आप एडजस्ट कर दे, वह सच में यात्रा का अनुभव बदल देगा। हालांकि, हम अभी उस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं। सीधी सी बात है, जब बात पैसों की आती है, तो एक छोटी सी गलती भी भारी पड़ती है।
अगर कोई एप आपको किसी खराब कैफे में भेज दे, तो सिर्फ एक घंटा खराब होता है, लेकिन अगर वह किसी ‘नान-रिफंडेबल’ टिकट पर गलत तारीख बुक कर दे, तो पूरी ट्रिप ही बर्बाद हो जाती है। स्काटलैंड और नार्वे में मेरी ज्यादातर बुकिंग्स ऐसी थीं, जिनमें पैसे वापस नहीं मिलते, इसलिए मैंने हर एक तारीख खुद री-चेक की। जब तक कोई आटोमेटेड सिस्टम गलती होने पर खुद जिम्मेदारी नहीं लेता!
याद रहता है वो अनुभव
एल्गोरिदम आपको यह बता सकता है कि लोफोटेन आइलैंड्स को बहुत अच्छी रेटिंग मिली है, लेकिन एआइ यह नहीं बता सकता कि आर्कटिक की ठंड में एक कैंपरवेन के भीतर आंखें खोलने का एहसास कैसा होता है या फिर टूटते तारों को देखने के लिए अपने सफर का रास्ता बदल लेना कितना जादुई था।
एल्गोरिदम समय और पैसों की बचत का हिसाब लगाते हैं, जबकि मेरी सिफारिशें एहसासों और अनुभवों पर टिकी होती हैं। लोग कभी सबसे छोटा रास्ता याद नहीं रखते; उन्हें तो बस वही पल याद रहता है, जहां थोड़ी सी गड़बड़ हुई और वह सफर की एक खूबसूरत कहानी बन गई।
इंतजार उन बदलावों का
अब ऐसा भी नहीं है कि आप एआइ को सिरे से नकार ही दें। हां, जिस तेजी से तकनीक में परिवर्तन आ रहा है, वह वाकई काबिलेतारीफ है। उम्मीद है कि दो-तीन सालों में एक आम यात्री बस अपनी पसंद बताएगा ( उदाहरण के लिए 10 दिन की यात्रा, पहाड़ी जगह, कम ठंड और बजट फ्रेंडली) और एआइ उसे तुरंत बुक करने योग्य पूरी योजना थमा देगा।
सफर में आने वाली किसी भी रुकावट के दौरान रि-बुकिंग अपने आप हो जाया करेगी, लेकिन जो चीज कभी नहीं बदलेगी, वह है हमारे यात्रा करने की वजह। जब यात्रा की योजना पर्दे के पीछे चली जाएगी, तो इंसान जिन कहानियों और अनुभवों की तलाश करता है, उनका महत्व और बढ़ जाएगा। यहीं पर हम जैसे ट्रैवल क्रिएटर्स का काम शुरू होता है।
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