कोलकाता में पली बढ़ी शर्मिला मोना सिन्हा ने अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित प्रतिष्ठित नेशनल विमेंस हॉल ऑफ फेम में शामिल होकर नया इतिहास रच दिया है।
वह पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंदिरा नूयी के बाद यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने वाली भारतीय मूल की दूसरी महिला बन गई।
परिवार में कराया जाता था निराशा का एहसास
कोलकाता में जन्मी शर्मिला को बचपन में परिवार की तीसरी बेटी बोने पर अक्सर लैंगिक पक्षपात और भारतीय समाज की पुरानी मानसिकता का सामना करा पड़ा था।
उन्होंने बचपन को याद करते हुए बताया कि समाज में बेटों को फायदे का सौदा और बेटियों को नुकसान माना जाता था। इसी भेदभाव को देखते हुए उन्होंने ठान लिया था कि वे उन सभी बंदिशों को तोड़ेंगी जो आमतौर पर लड़कों के लिए आरक्षित रखी जाती है।
दो बड़ी बातों का पड़ा गहरा प्रभाव
सिन्हा का सफर दुनिया बदलने के बड़े इरादों के साथ शुरू नहीं हुआ था, इसकी शुरुआत परिवार, उम्मीदों और गरीबी के ऐसे अनुभव से हुई जिसने उन पर गहरी छाप छोड़ी।
कोलकाता में मदर टेरेसा के अनाथालय में एक वॉलंटियर के तौर पर काम करते हुए, उन्हें सिर्फ अपने आस-पास की कमी या अभाव ही नहीं, बल्कि एक और परेशन करने वाली बात भी महसूस हुई अनाथालय में लड़के कम थे, उन्हें बताया गया था कि छोड़े गए लड़कों को आसानी से गोद ले लिया जाता था। यानी अनाथ बच्चों के मामले में भी जेंडर ही उनका भविष्य तय कर रहा था।
किशोरावस्था में उन्हें पता चला कि उनकी दादी ने आजादी के आंदोलन के दौरान महिलाओं को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई थी। इसने उन्हें व्यवस्था को चुनौती देने की प्रेरणा दी।
वॉल स्ट्रीट से लेकर ‘इक्वालिटी नाउ’ की CEO बनने तक का सफर
18 साल की उम्र में वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गईं। उन्होंने मैसाचुसेट्स के प्रतिष्ठित स्मिथ कॉलेज से इकोनॉमिक्स व आर्ट हिस्ट्री से ग्रेजुएशन और कोलंबिया बिजनेस स्कूल से MBA किया।
उन्होंने मॉर्गन स्टेनली में इन्वेस्टमेंट बैंकर के रूप में शुरुआत की और बाद में प्रॉक्टर एंड गैंबल, यूनिलीवर और एलिजाबेथ आर्डेन जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम किया।
सिन्हा ने अपनी कॉर्पोरेट और मैनेजमेंट स्किल्स का इस्तेमाल सामाजिक भलाई के लिए किया। उन्होंने वीमेन मूविंग मिलिंयस नेटवर्क का नेतृत्व किया, जिसके सदस्यों ने महिलाओं के कल्याण के लिए करीब 1 बिलियन डॉलर का फंड प्रतिबद्ध किया।
वे टू किल ए टाइगर जैसी ऑस्कर नॉमिनेटेड डॉक्यूमेंट्री की एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर भी रही हैं। 2022 से शर्मिला मोना सिन्हा अंतरराष्ट्रीय संगठन इक्वालिटी नाउ की CEO के रूप में काम कर रही हैं, जो बाल विवाह, यौन हिंसा और महिलाओं के कानूनी अधिकारों के लिए वैश्विक स्तर पर लड़ाई लड़ रहा है।
सिन्हा ने मां की सीख की याद
सम्मान समारोह के दौरान दिए गए भावुक भाषण में शर्मिला ने इस उपलब्धि का श्रेय अपनी मां की सीख को दिया। उन्होंने याद किया कि कैसे कोलकाता में उनकी मां रोज सुबह किसी जरूरतमंद के लिए मुट्ठी भर चावल अलग निकालकर रख देती थी।
शर्मिला ने कहा,’मैं इस असाधारण सम्मान को सिर्फ़ अपना नहीं मानती। मैं इसे मुट्ठी भर चावल की तरह स्वीकार करती हूँ, जो मुझे इस जिम्मेदारी के साथ सौंपे गए हैं कि मैं इसे आगे बढ़ाऊं।’
शर्मिला मोना सिन्हा का नेशनल विमेंस हॉल ऑफ फेम में शामिल होना यह साबित करता है कि अगर किसी बेटी को सही मौका दिया जाए और उस पर बंदिशे न लगाई जाएं तो वह दुनिया के सबसे बड़े मंच पर भी अपनी पहचान बना सकती है।
शर्मिला की कहानी भी अब एक जानी पहचानी भारतीय-अमेरिकी कहानी में जुड़ गई है। इंदिरा नूयी के बाद, भारत की एक और बेटी अमेरिका की महिला नेताओं की प्रतिष्ठित सूची में शामिल हो गई है।
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