हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय बेहद पवित्र माना जाता है। इस अवधि में हम अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति सम्मान और प्रेम-भाव प्रकट करते हैं। मान्यता है कि इन दिनों में हम पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य के जरिए उनकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं।
वैसे तो एक सामान्य नियम यह है कि परिवार के जिस सदस्य का निधन जिस तिथि को हुआ हो, पितृ पक्ष (Pitru Paksha 2026) के दौरान उसी तिथि पर उनका श्राद्ध किया जाता है।
लेकिन, कई बार हमें अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि याद नहीं होती या कुछ खास वजहों से हम तय दिन पर उनका श्राद्ध नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति के लिए पितृ पक्ष में मुख्य रूप से तीन तिथियों को खास रूप से महत्व दिया गया है। आइए इस आर्टिकल में जानेंगे कि कौन सी हैं ये तीन तिथियां और इनका महत्व क्या है।
सर्वपितृ अमावस्या
यह पितृ पक्ष की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण तिथि है। अगर आपको अपने किसी पूर्वज के निधन की सही तिथि नहीं मालूम है या फिर किसी वजह से आप उनकी तिथि पर श्राद्ध करना भूल गए हैं, तो सर्वपितृ अमावस्या (Sarva Pitru Amavasya) के दिन उनका श्राद्ध किया जा सकता है। इस दिन ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों को याद करके उनका तर्पण किया जाता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को होगी।
मातृ नवमी
यह नवमी तिथि विशेष रूप से परिवार की महिला पूर्वजों को समर्पित होती है। इस दिन घर की दिवंगत महिलाओं जैसे मां, दादी, या नानी का श्राद्ध करने की मान्यता है। जिन महिला पूर्वजों के निधन की तारीख पता न हो, उनका श्राद्ध भी मातृ नवमी (Matru Navami 2026) पर किया जा सकता है। इस साल यह 4 अक्टूबर, रविवार के दिन पड़ेगी।
महाभरणी श्राद्ध
इस खास तिथि का संबंध भरणी नक्षत्र से माना गया है। महाभरणी श्राद्ध उन परिजनों या पूर्वजों के लिए विशेष माना जाता है जिनकी मृत्यु आकस्मिक या अचानक हुई हो। कई परिवारों में यह परंपरा है कि निधन के एक साल पूरे होने के बाद ही यह श्राद्ध किया जाता है।
क्या सिर्फ इन्हीं तिथियों पर कर सकते हैं श्राद्ध?
पितृ पक्ष की हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व है। अगर आपको तिथि याद है, तो तय दिन पर श्राद्ध करना ही सबसे बेहतर माना जाता है। ये तीन तिथियां मुख्य रूप से उन लोगों की सुविधा और शांति के लिए हैं जिनकी कोई विशेष स्थिति रही हो।
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