मई 2025 में भारत के साथ सैन्य टकराव के दौरान पाकिस्तान के अनुभव ने परमाणु प्रतिरोध क्षमता की सीमाओं को उजागर कर दिया है। इसके बाद पाकिस्तान का ध्यान तेजी से अपनी पारंपरिक सैन्य शक्ति को मजबूत करने की ओर ध्यान लगा रहा है, अमेरिका की बुलेटिन ऑफ द एटॉमिक साइंटिस्ट्स की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है।
दक्षिण कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी हमले के जवाब में भारत द्वारा शुरू किए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद दोनों परमाणु-संपन्न पड़ोसियों के बीच यह सैन्य टकराव हुआ था।
रिपोर्ट के अनुसार, इस संघर्ष के बाद पाकिस्तान के रणनीतिक प्रतिष्ठान को कड़वी हकीकत का सामना करना पड़ा कि परमाणु हथियारों की अपनी सीमाएं हैं। वे न तो संकट को टाल सके, न ही भारत को पाकिस्तान के भीतर जाकर हमले करने से रोक पाए, और न ही युद्ध के दौरान इस्लामाबाद को कोई स्पष्ट रास्ता दे सके।
परमाणु हथियारों का घट रहा महत्व?
रिपोर्ट के अनुसार, मई 2025 के टकराव की पहली वर्षगांठ और मई 1998 के परमाणु परीक्षणों की वर्षगांठ के दौरान पाकिस्तान के सुरक्षा नैरेटिव में स्पष्ट बदलाव देखा गया। मई 2026 में जहां मार्का-ए-हक को राजकीय स्तर पर प्रमुखता दी गई, वहीं यौम-ए-तकबीर को बहुत कम तवज्जो मिली।
शरीफ भाईयों के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेताओं ने भी केवल सोशल मीडिया पर संक्षिप्त बयान दिए, जो ऐतिहासिक रूप से 1998 के परमाणु परीक्षणों का श्रेय लेती रही है।
इस्लामाबाद में सार्वजनिक पोस्टरों और अभियानों में पारंपरिक सैन्य सफलताओं और सेना के नेतृत्व को प्रमुखता से दिखाया गया, जबकि परमाणु हथियार और मिसाइलें दृश्य परिदृश्य से नदारद रहीं।
पारंपरिक सैन्य शक्ति को दे रहा प्राथमिकता
रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव पाकिस्तानी सेना के राजनीतिक हितों से जुड़ा है। पारंपरिक सैन्य उपलब्धियां जनता के सामने शक्ति का प्रदर्शन करने और सेना की छवि सुधारने का अधिक दृश्यमान माध्यम हैं।
गंभीर वैधता संकट का सामना कर रही सैन्य स्थापना के लिए परमाणु बम का जश्न मनाने की तुलना में पारंपरिक सैन्य सफलताओं को उजागर करना अधिक राजनीतिक मूल्य रखता है। इसी रणनीति के तहत पाकिस्तान ने अपने रक्षा बजट में वृद्धि की है और एक नई आर्मी रॉकेट फोर्स कमान की स्थापना की है।
फुल-स्पेक्ट्रम डिटॉरेंस की खुली पोल
रिपोर्ट ने पाकिस्तान के फुल-स्पेक्ट्रम डिटॉरेंस के सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, जिसके तहत दावा किया जाता था कि परमाणु हथियार हर स्तर के सैन्य आक्रमण को रोक सकते हैं। रिपोर्ट ने इसे एक बड़ा लेकिन झूठा वादा करार दिया।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर में 9 प्रमुख आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया और बाद में पाकिस्तान की सैन्य आक्रामकता के जवाब में 11 पाकिस्तानी एयरबेसों पर हमले किए। परमाणु का डर भारत को पाकिस्तान के अंदरूनी इलाकों में स्ट्राइक करने से नहीं रोक सका।
परमाणु हथियार खुद बने जोखिम
रिपोर्ट के मुताबिक, परमाणु हथियार संकट के दौरान समाधान बनने के बजाय अतिरिक्त जोखिम लेकर आए। इसने पाकिस्तान के जवाबी विकल्पों को सीमित कर दिया, क्योंकि पाकिस्तान द्वारा किसी भी पारंपरिक मिसाइल का परीक्षण या प्रक्षेपण भारत द्वारा परमाणु हमले की शुरुआत माना जा सकता था। पाकिस्तान के सामने चुनौती केवल जवाब देने की नहीं, बल्कि बिना किसी विनाशकारी गलतफहमी के जवाब देने की थी।
टकराव के अंतिम चरणों में, अमेरिका द्वारा युद्धविराम की घोषणा से ठीक पहले पाकिस्तान के राष्ट्रीय कमान प्राधिकरण की बैठक बुलाने की खबरें सामने आईं।
इसने इस बात को उजागर किया कि संकट किस हद तक बढ़ चुका था, जिससे परमाणु कमान चर्चा में आ गई और मार्जिन बेहद कम हो गया। अंततः अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हस्तक्षेप की मदद से स्थिति को बिगड़ने से रोका गया और युद्धविराम लागू हुआ।
परमाणु हथियार चाहने वाले देशों के लिए सबक
पाकिस्तान का यह अनुभव यह साबित करता है कि परमाणु हथियार सुरक्षा की सभी चुनौतियों का सार्वभौमिक समाधान नहीं हैं। जो देश परमाणु हथियार हासिल करने की होड़ में हैं, उन्हें केवल यह नहीं देखना चाहिए कि परमाणु हथियार क्या सुरक्षा प्रदान करते हैं, बल्कि यह भी समझना चाहिए कि वे किस प्रकार की सैन्य सीमाएं और जोखिम पैदा करते हैं।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal