अपने पिता के साथ स्कूल जा रहे एक पांच साल के बच्चे को टैंकर ने कुचल दिया। इस दर्दनाक हादसे की जगह पर न तो कोई फुटपाथ था और न ही पैदल सड़क पार करने के लिए कोई सुरक्षित पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग। इसी तरह के एक मुआवजे के मामले मनियार इलियाज शेख रियाज बनाम पी. अय्यप्पन में 19 जून को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने सुरक्षित और सीमांकित फुटपाथों पर चलने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) (मुक्त आवाजाही का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के तहत मौलिक अधिकार घोषित कर दिया है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक सड़कों तक पहुंच के मामले में हमारे अधिकारों की व्यवस्था में सुधार नहीं किया जाता, तब तक ऐसे हादसे अपरिहार्य रूप से होते रहेंगे। कोर्ट ने यह भी कहा कि मोटर वाहन अधिनियम 1988 पैदल चलने के मौलिक अधिकार को मान्यता नहीं देता है, और असल में इस कानून ने कई मायनों में पैदल चलने वालों के अधिकारों को कमजोर ही किया है।
द चैंबर्स ऑफ भरत चुघ के वकील मयंक अरोड़ा ने कहा कि विडंबना यह रही है कि हमने हमेशा फ्लाईओवर, एक्सप्रेसवे और बड़ी सड़क परियोजनाओं का तो जश्न मनाया है, लेकिन आवाजाही की सबसे बुनियादी इकाई यानी पैदल यात्री को नजरअंदाज कर दिया। इस फैसले से फुटपाथों की कल्पना का तरीका बदलना चाहिए। वे निरंतर, चलने योग्य, सुरक्षित, सुलभ और बाधा मुक्त होने चाहिए।
आंकड़े बताते हैं कि इस साल जनवरी से मार्च तक, दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ने गलत या बाधा उत्पन्न करने वाली पार्किंग के लिए मौके पर ही 4,30,202 चालान काटे हैं, जो शहर का सबसे ज्यादा किया जाने वाला ट्रैफिक अपराध है।
पैदल यात्रियों की मौतों का संकट
दिल्ली में एक साधारण सैर से ही पता चल जाता है कि यहां के ज्यादातर फुटपाथ कितने बेकार हो चुके हैं। टूटे हुए स्लैब, गड्ढे और हर तरफ बिखरा कचरा आम बात है। वे जगह-जगह से खुदे हुए हैं या अचानक खत्म हो जाते हैं। यह मजबूरी में लोगों को मुख्य सड़क पर चलने के लिए धकेलता है, जहां वाहनों की चपेट में आने का खतरा बना रहता है।
IIT दिल्ली के परिवहन अनुसंधान और चोट निवारण केंद्र द्वारा तैयार भारत सड़क सुरक्षा स्थिति रिपोर्ट बताती है कि जम्मू-कश्मीर में फुटपाथ की उपलब्धता मात्र 3% है, जबकि महाराष्ट्र में यह लगभग 73% है। बिहार, हरियाणा और पुडुचेरी जैसे राज्यों में उपयोग लायक फुटपाथ न के बराबर हैं।
सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा 2024 के लिए जारी हालिया आंकड़ों से पता चला है कि 2019 से 2024 के बीच भारत भर में सड़क दुर्घटनाओं में 1.8 लाख से अधिक पैदल यात्री मारे गए। यह सालाना औसतन 30,500 मौतों का आंकड़ा है। इनमें से लगभग 31% मौतें राष्ट्रीय राजमार्ग (NH) नेटवर्क पर हुईं।
इनमें से 54% मौतें दोपहिया वाहनों और कारों की टक्कर से हुईं। सुरक्षित फुटपाथों का अभाव देश में पैदल चलने वालों की मृत्यु दर के पीछे का मुख्य कारण है, जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक है।
विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक सीमित सड़कें
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इसे अजीब बताया कि हमारा ध्यान चलने के इस अधिकार को सुरक्षित करने पर क्यों नहीं गया। कोर्ट ने कहा कि शायद पहियों ने हमारी कल्पना को ग्रहण लगा दिया था, और हमारा नगरपालिका प्रशासन केवल मोटर वाहनों के अनुकूल सड़कें बनाने में व्यस्त था।
कोर्ट ने आगे कहा, “यह शुरुआत में एक कुलीन वर्ग की मानसिकता भी हो सकती है, क्योंकि पहियों वाली मशीनें केवल अमीरों के लिए थीं। लेकिन जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी, सड़कों पर पूरी तरह से मोटर चालित परिवहन का दबदबा हो गया, और पैदल चलने वालों को इस हद तक किनारे कर दिया गया कि उन्हें ड्राइवरों के लिए एक ‘परेशानी’ माना जाने लगा।”
बिहार के समस्तीपुर की रहने वाली श्वेता राज कहती हैं, जैसे ही आप राजधानी (पटना) से बाहर निकलते हैं, फुटपाथ गायब होने लगते हैं। ग्रामीण इलाकों में तो मुख्य सड़कें भी ठीक से नहीं बनी हैं। काम करने वाले फुटपाथ तो दूर की बात हैं।
आपके चलने के अधिकार में क्या बाधाएं हैं?
रेहड़ी-पटरी वाले हॉकर्स, अतिक्रमण और आजीविका कमाने के अधिकार का सवाल भी एक बड़ी बहस है। भारत के किसी भी शहर में घूमें, आपको कई रेहड़ी-पटरी वाले, खाने के स्टॉल और सिगरेट-फूल की दुकानें फुटपाथ पर मिल जाएंगी। कई लोग तो दशकों से फुटपाथ पर एक ही जगह से अपनी आजीविका कमा रहे हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार, देश में बेघर लोग अक्सर चोरी, नशीली दवाओं और मच्छरों के डर से रैन-बसेरों के बजाय फुटपाथ पर सोना पसंद करते हैं। फुटपाथ उन्हें बंद जगहों की उमस भरी गर्मी से भी राहत देते हैं।
कानून लागू करने में खामियां
वकील अरोड़ा ने कहा कि इस फैसले का असली परीक्षण इसकी घोषणा में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर इसके अंतिम क्रियान्वयन में होगा। राज्य सरकारों और नगर निकायों को अब नागरिकों के बिना डर के चलने के अधिकार की रक्षा के लिए लागू करने योग्य कानून बनाने चाहिए।
मुंबई की 23 वर्षीय निवासी प्रोतिची चटर्जी ने बताया कि उनके अपार्टमेंट के ठीक सामने चार महीने तक फुटपाथ सहित पूरी सड़क खुदी पड़ी थी। मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज की छात्रा प्रोतिची ने कहा, “एक बच्चे की जान चली गई, जिसके बाद कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के तहत पैदल चलने को मौलिक अधिकार घोषित किया। लेकिन अधिकारों को लागू करने का कर्तव्य भी राज्य का है। बिना उचित प्रवर्तन के अधिकारों का कोई उद्देश्य पूरा नहीं होता।”
विकलांगों के लिए यह चुनौती और भी बड़ी है। ‘ब्रिटल बोन डिजीज’ से पीड़ित साहुकरी रुचिता अपनी व्हीलचेयर में दिल्ली के फुटपाथों पर चलने की कठिनाई के बारे में बताती हैं। स्ट्रीट पोल और पेड़ अक्सर संकरे फुटपाथों के ठीक बीच में लगे होते हैं, जो विकलांग लोगों के लिए एक बड़ी बाधा है।
फुटपाथों का महत्व
बीबीसी के अनुसार, 100 किमी नए फुटपाथों ने चेन्नई के पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा को कैसे प्रभावित किया। अध्ययन में पाया गया कि सर्वेक्षण में शामिल 9% से 27% लोगों ने नए फुटपाथों के कारण मोटर वाहनों से सफर छोड़कर पैदल चलना शुरू कर दिया, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और प्रदूषण में कमी आई। इससे महिलाओं और कम आय वाले निवासियों के लिए आर्थिक बचत के अवसर भी पैदा हुए।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि पैदल चलने की प्रक्रिया ने हमेशा से भारतीय कल्पना को बांधे रखा है, जिसकी जड़ें संस्कृति, समाज, राजनीति और सुधार आंदोलनों में गहरी हैं। इसने स्वतंत्रता संग्राम के कुछ आदर्शों को प्रेरित करने में भी मदद की थी।
वकील अरोड़ा कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है। सड़कों पर केवल मोटर वाहनों का एकाधिकार नहीं है। यदि सड़क है, तो एक सुरक्षित फुटपाथ भी होना चाहिए। पैदल चलना राज्य द्वारा दिया गया कोई विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
एक दर्दनाक हादसे के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने के अधिकार को बरकरार रखा है। अब सवाल यह है कि क्या देश, कोर्ट के इन कदमों पर चलेगा या नहीं।
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