गर्मियों की दोपहर में भारत के किसी भी शहर में घूमिए तो एक बात तुरंत साफ हो जाती है कि गर्मी सिर्फ सूरज से नहीं आती। यह सड़कों और कंक्रीट की दीवारों से निकलती, कांच की दीवारों से टकराकर वापस आती है और तो और सूरज डूबने के बाद भी गर्मी बनी रहती है।
तो अर्बन हीट आइलैंड (Urban Heat Island) इफेक्ट में आपका स्वागत है। यह एक ऐसी अनदेखी घटना है जो चुपचाप भारत के शहरों को उनके आस-पास के इलाकों के मुकाबले कई डिग्री ज्यादा गर्म बना रही है।
शहर समस्या को और गंभीर बना रहे
जलवायु परिवर्तन निश्चित रूप से तापमान बढ़ा रहा है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे अपने शहर ही इस समस्या को और भी गंभीर बना रहे हैं। हम जो इमारतें बनाते हैं, जो सड़कें बनाते हैं, जो पेड़ काटते हैं और यहां तक कि जो सामान चुनते हैं वे सब शहरी भारत को गर्मी जमा करने वाली विशाल जगहों में बदल रहे हैं।
और जब तक शहर अपने बढ़ने का तरीका नहीं बदलते, गर्मियां और भी ज्यादा कष्टकारी होती जाएंगी। नेचर सिटीज में प्रकाशित 2024 की एक स्टडी में पाया गया कि अकेले शहरीकरण ने भारतीय शहरों में गर्मी को लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है और तेजी से बढ़ रहे टियर-II शहरों में इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखी गई है।
स्टडी इस बात पर जोर देती है कि जलवायु परिवर्तन और शहरी विकास अब एक साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जिससे शहरों में गांवों की तुलना में तेजी से गर्मी बढ़ रही है।
जब शहर ही बन जाते हैं भट्टी
अर्बन हीट आइलैंड (UHI) का असर तब होता है जब शहर प्राकृतिक जगहों की जगह कंक्रीट, डामर, स्टील और कांच का इस्तेमाल करते हैं। ये सतहें दिन के समय सूरज की बहुत ज्यादा गर्मी सोख लेती हैं। उस गर्मी को जल्दी बाहर निकालने के बजाय वे उसे जमा कर लेती हैं और सूरज डूबने के बाद भी घंटों तक उसे वापस छोड़ती रहती हैं।
इसमें बाहर गर्म हवा फेंकने वाले हजारों एयर-कंडीशनर, भारी ट्रैफिक, ऊंची इमारतों के बीच हवा का कम बहाव और कम होती हरियाली को जोड़ दें तो शहर एक बड़ी भट्टी की तरह गर्मी को रोकने लगते हैं।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के अनुसार, शहर दुनिया के औसत तापमान बढ़ने की दर से लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहे हैं। अगर मौजूदा हालात ऐसे ही बने रहे तो 2050 तक दुनिया भर में लगभग 1.6 अरब शहरी लोग भीषण गर्मी की चपेट में आ सकते हैं।
इसका नतीजा कुछ ऐसा है जिसका अनुभव लाखों भारतीय हर गर्मी में करते हैं।
ज्यादा गर्म दिन
ज्यादा गर्म रातें
बिजली का ज्यादा बिल
स्वास्थ्य को ज्यादा जोखिम
ज्यादा जोखिम में क्यों हैं भारतीय शहर?
भारत में तेजी से शहरीकरण हो रहा है। हर साल शहर और फैलते जा रहे हैं। इमारतें ऊंची होती जा रही हैं। सड़कें चौड़ी हो रही हैं। हरियाली वाली जगहें कम हो रही हैं। आर्थिक विकास के लिए यह बढ़ोतरी जरूरी है लेकिन जानकारों का कहना है कि जलवायु के प्रति संवेदनशील भी होना जरूरी है।
NAREDCO के प्रेसिडेंट परवीन जैन का मानना है कि अर्बन हीट आइलैंड का असर अब सिर्फ पर्यावरण से जुड़ी चिंता नहीं रह गया है। वे कहते हैं, “यह लोगों के रहने के तरीके पर सीधे असर डालता है, जिससे घर के अंदर का तापमान बढ़ता है, बिजली की खपत बढ़ती है और लोगों की सेहत पर भी असर पड़ता है।”
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
उनका मानना है कि समाधान की शुरुआत घर से ही होती है। जैन का कहना है कि सस्टेनेबिलिटी (टिकाऊपन) को कोई लग्जरी या विलासिता की चीज मानने के बजाय हर नए रिहायशी प्रोजेक्ट को शुरू से ही गर्मी से निपटने के हिसाब से डिजाइन किया जाना चाहिए।
इसका मतलब है कि पैसिव कूलिंग, प्राकृतिक हवा-दार घर, ठंडी छतें, बारिश के पानी का संचयन, छत पर सोलर पैनल, पानी सोखने वाली जमीन, गंदे पानी की रीसाइक्लिंग, पेड़-पौधे और ऊर्जा बचाने वाले मटीरियल अब खास या महंगी चीजें नहीं, बल्कि आम सुविधाएं बन जाएंगे और इसका काफी बड़ा फायदा हो सकता है।
UNEP के अनुमानों का हवाला देते हुए जैन बताते हैं कि पैसिव कूलिंग के तरीकों से बिजली की खपत 35 प्रतिशत तक कम हो सकती है, घर के अंदर का तापमान लगभग 3 डिग्री सेल्सियस तक घट सकता है और घरों को एयर-कंडीशनिंग के बिना काफी लंबे समय तक आरामदायक बनाए रखा जा सकता है।
जैन कहते हैं, “भारतीय रियल एस्टेट का भविष्य सिर्फ इस बात से नहीं आंका जाएगा कि हम कितने घर बनाते हैं, बल्कि इस बात से आंका जाएगा कि वे घर बदलते मौसम के हिसाब से कितने बेहतर हैं। सस्टेनेबल और जलवायु-अनुकूल आवास अब कोई प्रीमियम सुविधा नहीं रह गई है। यह एक जरूरत बनती जा रही है।”
इसी तरह कांच की इमारतें देखने में भले ही आधुनिक लगें लेकिन वे हमेशा स्मार्ट नहीं होतीं। दशकों तक भारतीय शहरों ने कांच से बनी ऑफिस की इमारतों को आधुनिक आर्किटेक्चर की पहचान के तौर पर अपनाया लेकिन जो चीजें ठंडे पश्चिमी मौसम में काम करती हैं वे अक्सर भारत के गर्म और उमस भरे मौसम में ठीक से काम नहीं करतीं।
लोहिया वर्ल्डस्पेस के मैनेजिंग डायरेक्टर पीयूष लोहिया का कहना है कि आर्किटेक्चर के इस ट्रेंड ने अनजाने में ही शहरों को ज्यादा गर्म बना दिया है। उनके अनुसार, घनी बसावट, हरियाली का कम होना और गर्मी सोखने वाली चीजों के ज्यादा इस्तेमाल से शहरी इलाके आस-पास के इलाकों की तुलना में 5 से 10 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा गर्म हो सकते हैं।
कमर्शियल इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। लोहिया का कहना है कि कांच के ज्यादा इस्तेमाल वाले बाहरी हिस्से (ग्लास फसाड) सूरज की गर्मी को बहुत ज्यादा अंदर आने देते हैं, जिससे इमारतों को ठंडा रखने के लिए कहीं ज्यादा बिजली की खपत करनी पड़ती है।
वे कहते हैं, “कमर्शियल रियल एस्टेट के भविष्य में सिर्फ दिखावट के बजाय थर्मल क्षमता और उसमें रहने वालों की भलाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।” उनका तर्क है कि इमारतें सिर्फ शानदार दिखनी ही नहीं चाहिए। उन्हें प्राकृतिक रूप से ठंडा रहना चाहिए। पेड़ सिर्फ सजावट की चीज नहीं हैं, वे बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं। कंक्रीट गर्मी सोखता है, जबकि पेड़ उसे दूर करते हैं।
केसरी इन्फ्राबिल्ड की मैनेजिंग डायरेक्टर मिनल श्रीनिवासन का मानना है कि डेवलपर्स को सिर्फ इमारतें बनाने से आगे बढ़कर बेहतर शहरी इकोसिस्टम बनाने पर ध्यान देना चाहिए। उनके सुझावों में ग्रीन रूफ, वर्टिकल गार्डन, सीढ़ीदार लैंडस्केप, स्पंज पार्क, पानी सोखने वाले फर्श और इकोलॉजिकल कॉरिडोर शामिल हैं।
ये उपाय न सिर्फ तापमान कम करते हैं, बल्कि भूजल को फिर से भरने में मदद करते हैं और भारी बारिश के दौरान बाढ़ को भी कम करते हैं। श्रीनिवासन मियावाकी जंगलों का भी जिक्र करते हैं, जो शहरों की छोटी जगहों में घने और स्थानीय पेड़-पौधों वाले जंगल बनाते हैं।
शहरों को ठंडा रखने के लिए ग्रह को ठंडा रखना जरूरी
अजीब बात यह है कि भीषण गर्मी से बचने के लिए सबसे आम तरीकों में से एक तरीका शहरों को और भी गर्म बना रहा है। एयर-कंडीशनर घर के अंदर की गर्मी को बाहर निकालकर जगह को ठंडा करते हैं। जब लाखों एयर-कंडीशनर एक साथ चलते हैं तो वे बाहर का तापमान बढ़ा देते हैं, बिजली की मांग बढ़ाते हैं और पहले से ही दबाव झेल रहे पावर ग्रिड पर और बोझ डालते हैं।
यही वजह है कि UNEP जैसे संगठन जहां भी संभव हो, मैकेनिकल कूलिंग के बजाय पैसिव कूलिंग को अपनाने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। प्रकृति पर आधारित समाधान, रिफ्लेक्टिव छतें, छायादार सड़कें, बेहतर शहरी डिजाइन और बेहतर निर्माण सामग्री एयर-कंडीशनर की जरूरत पड़ने से पहले ही गर्मी को कम कर देते हैं।
कैसे होने चाहिए अगली पीढ़ी के घर?
अर्बन हीट आइलैंड का असर होना कोई जरूरी बात नहीं है। यह मुख्य रूप से डिजाइन से जुड़ी समस्या है। इसका मतलब है कि इसका समाधान भी डिजाइन के जरिए ही निकाला जा सकता है। जिन शहरों में ज्यादा पेड़-पौधे होते हैं, वे ज्यादा ठंडे रहते हैं।
स्थानीय मौसम के हिसाब से डिजाइन की गई इमारतें कम ऊर्जा की खपत करती हैं। पानी सोखने वाली सड़कें बाढ़ को कम करती हैं और सतह के तापमान को भी घटाती हैं। सफेद या रिफ्लेक्टिव छतें सूरज की रोशनी को सोखने के बजाय वापस वातावरण में लौटा देती हैं। इनमें से कोई भी विचार भविष्य की कल्पना नहीं है, ज्यादातर तो पहले से ही मौजूद हैं।
चुनौती यह है कि भारत में शहरों के तेजी से फैलने और दशकों तक गर्मी बढ़ने की स्थिति बनने से पहले ही इन्हें बड़े पैमाने पर लागू किया जाए। क्योंकि अगली हीटवेव सिर्फ ग्लोबल क्लाइमेट चेंज से ही तय नहीं होगी, बल्कि उन शहरों से भी तय होगी जिन्हें हम बसाएंगे।
Live Halchal Latest News, Updated News, Hindi News Portal