क्या प्रेग्नेंसी को हाई रिस्क बना देती है सिकल सेल डिजीज…

मां बनना एक बेहद सुखद अहसास है, लेकिन अगर कोई महिला ‘सिकल सेल डिजीज’ के साथ इस सफर की शुरुआत कर रही है, तो उसे थोड़ी ज्यादा सावधानी और सही प्लानिंग की जरूरत होती है।

दरअसल, सिकल सेल खून से जुड़ी एक जेनेटिक बीमारी है। इसमें शरीर की लाल रक्त कोशिकाएं अपना सामान्य आकार खोकर अर्धचंद्र जैसी हो जाती हैं, जिससे शरीर के अंगों तक खून का बहाव और ऑक्सीजन सही से नहीं पहुंच पाती। आज मेडिकल साइंस की मदद से सिकल सेल वाली महिलाओं के लिए मां बनना काफी सुरक्षित हो गया है, फिर भी यह एक ‘हाई-रिस्क’ स्थिति है जिसमें कई डॉक्टरों की निगरानी बेहद जरूरी होती है।

आइए, डॉ. सत्य प्रकाश यादव (सीनियर डायरेक्टर, पीडियाट्रिक बोन मैरो ट्रांसप्लांट, मेडिकल ऑन्कोलॉजी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट, कैंसर केयर, मेदांता गुरुग्राम) से समझते हैं कि इस दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

प्रेगनेंसी में शरीर के बदलावों का असर
प्रेगनेंसी के दौरान किसी भी महिला के शरीर में कई प्राकृतिक बदलाव होते हैं- जैसे खून की मात्रा का बढ़ना, शरीर को ज्यादा ऑक्सीजन की जरूरत होना और दिल तथा किडनी पर अतिरिक्त भार पड़ना।

सिकल सेल से पीड़ित महिलाओं के लिए ये सामान्य बदलाव मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। ऐसे में उन्हें नसों में रुकावट से होने वाले तेज दर्द, खून की भारी कमी, सीने में तकलीफ और इन्फेक्शन का खतरा आम महिलाओं के मुकाबले काफी ज्यादा होता है। यही वजह है कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत ज्यादा पड़ सकती है।

मां और बच्चे की सेहत से जुड़े जोखिम
गर्भ में पल रहे बच्चे पर असर: सिकल सेल के कारण प्लेसेंटा तक खून और ऑक्सीजन का बहाव धीमा हो सकता है। जब बच्चे को सही मात्रा में पोषण नहीं मिलता, तो उसका विकास धीमा होना, जन्म के समय वजन कम होना या समय से पहले डिलीवरी होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ गंभीर मामलों में तो मृत बच्चे के जन्म का खतरा भी रहता है। इसलिए गर्भ में बच्चे की ग्रोथ को बार-बार मॉनिटर करना बहुत जरूरी है।
मां की सेहत पर असर: इस दौरान मां को हाई ब्लड प्रेशर, प्रीक्लेम्पसिया, किडनी की परेशानी या खून के थक्के जमने जैसी गंभीर दिक्कतें हो सकती हैं। इसके अलावा, खून की कमी के कारण बहुत ज्यादा थकान हो सकती है और कई बार बाहर से खून चढ़ाने की नौबत भी आ सकती है।

प्रेगनेंसी से पहले की तैयारी
सिकल सेल के साथ एक सुरक्षित प्रेगनेंसी के लिए सबसे जरूरी है- वक्त रहते सही प्लानिंग। मां बनने का मन बनाने से पहले ही एक हेमेटोलॉजिस्ट और हाई-रिस्क प्रेगनेंसी संभालने वाले स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

दवाइयों में बदलाव: सिकल सेल के लिए दी जाने वाली कुछ दवाएं गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए सुरक्षित नहीं होतीं। इसलिए डॉक्टर प्रेगनेंसी से पहले ही इलाज के तरीके में जरूरी बदलाव कर देते हैं।
पोषण और बचाव: खानपान का ध्यान रखना, फोलिक एसिड लेना, शरीर में पानी की कमी न होने देना और खुद को इन्फेक्शन से बचाकर रखना इस सफर का बहुत अहम हिस्सा है।

डिलीवरी और उसके बाद का समय
चुनौती सिर्फ 9 महीने की नहीं होती। डिलीवरी के समय भी डॉक्टरों को यह ध्यान रखना होता है कि मां के शरीर में ऑक्सीजन या पानी की कमी न हो। स्थिति को देखते हुए हर महिला की डिलीवरी का तरीका अलग तय किया जाता है।

बच्चा होने के बाद भी खतरे पूरी तरह खत्म नहीं होते। डिलीवरी के बाद इन्फेक्शन, थक्के जमने या सिकल सेल का दर्द उभरने की आशंका बनी रहती है, इसलिए बाद की देखभाल को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

सही देखभाल से मिलती है सफलता
ये सारी बातें भले ही थोड़ी चिंताजनक लगें, लेकिन सच्चाई यह है कि सही समय पर पहचान और लगातार देखभाल से सिकल सेल से पीड़ित ज्यादातर महिलाएं स्वस्थ बच्चों को जन्म देती हैं।

बस जरूरत है तो इस बीमारी को लेकर परिवार और मरीजों में सही जागरूकता की। समय पर डॉक्टरों से जांच और एक अच्छी मेडिकल टीम के साथ मिलकर लिए गए सही फैसलों से मां और बच्चा, दोनों इस सफर को सुरक्षित तरीके से पूरा कर सकते हैं।

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