बिहार: 1934 के भूकंप और तूफानों को झेलकर भी अडिग है 700 साल पुराना वट वृक्ष

बिहार के मुंगेर जिले में स्थित आईटीसी पार्क परिसर का 700 वर्ष पुराना विशाल वट वृक्ष अब राष्ट्रीय स्तर पर पहचान हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। वैज्ञानिक जांच में इसकी आयु लगभग सात शताब्दी प्रमाणित होने के बाद इसे ‘हेरिटेज ट्री’ यानी प्राकृतिक धरोहर वृक्ष घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। यदि यह प्रक्रिया पूरी होती है तो यह देश के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर वृक्षों में शामिल हो सकता है।

सर्वेक्षण में सामने आई ऐतिहासिक पहचान
इस ऐतिहासिक वट वृक्ष की विशेष पहचान वर्ष 2022 में बिहार जैव विविधता बोर्ड द्वारा कराए गए सर्वेक्षण के दौरान हुई थी। सर्वेक्षण के बाद वैज्ञानिकों ने इसकी उम्र का पता लगाने के लिए कार्बन डेटिंग तकनीक का उपयोग किया। जांच में यह सामने आया कि वृक्ष की आयु करीब 700 वर्ष है।

100 मीटर क्षेत्र में फैला है विशाल वट वृक्ष
यह विशाल वट वृक्ष लगभग 100 मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई करीब 60 फीट है। इसकी सैकड़ों हवाई जड़ें समय के साथ नए तनों का रूप ले चुकी हैं, जिससे यह पूरा क्षेत्र एक छोटे जंगल जैसा दिखाई देता है। यही विशेषता इसे अन्य वृक्षों से अलग और बेहद खास बनाती है।

भूकंप और तूफानों के बावजूद अडिग रहा वृक्ष
स्थानीय लोगों के अनुसार यह वट वृक्ष वर्ष 1934 के विनाशकारी भूकंप सहित कई भीषण आंधी-तूफानों का सामना कर चुका है। प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद यह आज भी मजबूती से खड़ा है और मुंगेर की ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक बना हुआ है।

संरक्षण के लिए बनाई जा रही विशेष योजना
वन प्रमंडल पदाधिकारी अमरीश कुमार मल्ल ने बताया कि इस ऐतिहासिक वृक्ष के संरक्षण और वैज्ञानिक देखरेख के लिए विशेष योजना तैयार की जा रही है। इसके तहत वृक्ष की नियमित निगरानी और संरक्षण के उपाय किए जाएंगे।

विशेषज्ञों ने बताई नियमित निगरानी की जरूरत
वानिकी विशेषज्ञों का कहना है कि इस दुर्लभ वट वृक्ष की हवाई जड़ों, शाखाओं और मुख्य तने की समय-समय पर वैज्ञानिक जांच और निगरानी जरूरी है। इससे इसकी सेहत बेहतर बनी रहेगी और आने वाली पीढ़ियां भी इस प्राकृतिक धरोहर को देख सकेंगी।

मुंगेर की सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत का प्रतीक
यह 700 वर्ष पुराना वट वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि मुंगेर की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। हेरिटेज ट्री का दर्जा मिलने से इसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत होगी तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता भी बढ़ेगी।

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