विशेष सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम संकल्प ध्वनिमत से पारित, सीएम रेखा ने किया ‘रण’ का एलान

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की ओर से प्रस्तुत इस संकल्प पर सदन में विस्तृत चर्चा हुई। चर्चा के दौरान भाजपा सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने विपक्षी दलों पर महिला विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाया, जबकि कुछ समय के लिए सदन में मौजूद आम आदमी पार्टी के विधायकों ने भाजपा की नीयत पर सवाल उठाए।

विधानसभा के एक दिवसीय विशेष सत्र में मंगलवार को नारी शक्ति वंदन अधिनियम के क्रियान्वयन को लेकर महत्वपूर्ण संकल्प पारित किया गया। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की ओर से प्रस्तुत इस संकल्प पर सदन में विस्तृत चर्चा हुई। चर्चा के दौरान भाजपा सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने विपक्षी दलों पर महिला विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाया, जबकि कुछ समय के लिए सदन में मौजूद आम आदमी पार्टी के विधायकों ने भाजपा की नीयत पर सवाल उठाए।

इस मौके पर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने महिला आरक्षण के मुद्दे को देश की आधी आबादी के अधिकार और सम्मान से जुड़ा बताते हुए कहा कि यह केवल एक विधेयक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समान भागीदारी का प्रश्न है। उन्होंने महिलाओं से आह्वान किया कि अब अधिकारों के लिए स्वयं खड़े होने का समय है।

उन्होंने जोर देकर कहा, ‘’अब याचना नहीं, रण होगा, महासंग्राम भीषण होगा।’’ मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ के माध्यम से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करने का ऐतिहासिक प्रयास किया, लेकिन विपक्षी दलों ने तकनीकी बहानों और राजनीतिक स्वार्थ के चलते इसे आगे बढ़ने से रोका।

मुख्यमंत्री ने 16, 17 और 18 अप्रैल को हुए घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र का दुखद अध्याय बताते हुए कहा कि देशभर की महिलाएं उम्मीद लगाए बैठी थीं कि दशकों पुराना इंतजार खत्म होगा, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। उन्होंने कहा कि 27 वर्षों में सात बार महिला आरक्षण विधेयक संसद में आया, पर हर बार बाधाएं खड़ी की गईं।

रेखा गुप्ता ने कहा कि महिलाओं को संविधान ने समान अधिकार दिए, लेकिन राजनीतिक अवसर नहीं मिले। मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर “तकनीकी राजनीति” करने का आरोप लगाते हुए कहा कि परिसीमन, सीटों की संख्या और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दों को बहाने के रूप में इस्तेमाल किया गया।

वहीं आम आदमी पार्टी पर निशाना साधते हुए रेखा गुप्ता ने कहा कि ‘सत्याग्रह’ जैसे पवित्र शब्द का इस्तेमाल न्यायिक प्रक्रिया से बचने के लिए नहीं होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग स्वयं को कानून से ऊपर मानते हैं और न्यायिक संस्थाओं पर सवाल उठाकर लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।

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