ज्योतिष शास्त्र में मेष संक्रांति का विशेष महत्व माना गया है, क्योंकि इस दौरान सूर्य देव अपनी सबसे उच्च राशि यानी मेष में प्रवेश करते हैं। जब सूर्य मेष राशि में होते हैं, तो उनकी ऊर्जा चरम पर होती है।
साथ ही मेष संक्रांति, सौर नववर्ष का आगाज भी है, जिसपर खरमास की समाप्ति होती है। चलिए पढ़ते हैं मेष संक्रांति पर स्नान-दान का महुर्त क्या रहने वाला है। साथ ही जानते हैं कि इस दिव्य ऊर्जा का लाभ उठाने के लिए आप कौन-कौन से कार्य कर सकते हैं।
मेष संक्रांति शुभ मुहूर्त
मेष संक्रांति का क्षण – सुबह 9 बजकर 39 मिनट पर
मेष संक्रांति पुण्य काल – सुबह 5 बजकर 57 मिनट से दोपहर 1 बजकर 55 मिनट तक
मेष संक्रांति महा पुण्य काल – सुबह 7 बजकर 30 मिनट से सुबह 11 बजकर 47 मिनट तक
इस तरह करें दिन की शुरुआत
मेष संक्रांति पर दिन की शुरुआत किसी पवित्र नदी जैसे गंगा या यमुना में स्नान से करें। अगर यह संभव न हो, तो आप घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर भी स्नान कर सकते हैं।
इसके बाद तांबे के लोटे में जल, लाल फूल, अक्षत, कुमकुम व रोली डालें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। अर्घ्य देते समय ॐ सूर्याय नम: व “ॐ घृणि सूर्याय नमः” मंत्र का जप करें।
यदि आप ऑफिस की राजनीति, करियर की बाधाओं या आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहे हैं, तो ‘आदित्य हृदय स्तोत्र’ का पाठ भी जरूर करें।
इस दिन को पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भी उत्तम माना गया है। ऐसे में इस तिथि पर तर्पण या श्राद्ध कर्म जरूर करें।
मिलता है 100 गुना फल
मेष संक्रांति के साथ ही ‘खरमास’ की समाप्ति भी होती है और मांगलिक कार्यों के द्वार खुल जाते हैं। हालांकि, संक्रांति के पुण्य काल तक इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है –
मेष संक्रांति के बाद विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य शुरू किए जा सकते हैं।
मेष संक्रांति पर सत्तू और मिट्टी के घड़े का दान जरूर करें। यह दान धार्मिक रूप से शुभ माना गया है।
अपनी क्षमतानुसार गरीबों को धन और अन्न दान करें, क्योंकि संक्रांति पर किए गए दान का 100 गुना फल मिलता है।
भूल से भी न करें इस तरह का दान
मेष संक्रांति पर आपको दान का पुण्य फल तभी मिल सकता है, जब आप कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें। इस दिन पर फटे-पुराने कपड़ों व जूतों आदि का दान नहीं करना चाहिए। इससे आपको शुभ की जगह अशुभ परिणाम भी झेलने पड़ सकते हैं। वहीं अगर आप भोजन का दान कर रहे हैं, तो वह पूरी तरह से सात्विक होना चाहिए और जूठा नहीं होना चाहिए, वरना इससे भी आपको दान का पुण्य फल नहीं मिलता।
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