“मैं इस युद्ध में कोई शस्त्र नहीं उठाऊंगा, केवल अर्जुन का सारथी बनूंगा।” हम सभी जानते हैं कि महाभारत का युद्ध शुरू होने से पहले भगवान श्री कृष्ण ने यह कठिन प्रतिज्ञा ली थी। यह युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, बल्कि सिद्धांतों और प्रतिज्ञाओं का भी युद्ध था। लेकिन, युद्ध के 9वें दिन कुछ ऐसा हुआ कि त्रिलोकीनाथ को अपना ही वचन मजबूरन तोड़ना पड़ा। महाभारत के भीष्म पर्व और पौराणिक कथाओं में इस घटना का बहुत ही मार्मिक वर्णन मिलता है।
भीष्म पितामह की भीषण प्रतिज्ञा
कहानी की शुरुआत 8वें दिन की रात से होती है। कौरवों की हार से निराश दुर्योधन ने भीष्म पितामह पर आरोप लगाया कि वे पांडवों के प्रति नरम रुख अपना रहे हैं। इस बात से आहत होकर भीष्म पितामह ने एक भयानक प्रतिज्ञा ले ली। उन्होंने कहा कि, “कल मैं ऐसा युद्ध करूंगा कि या तो अर्जुन मरेगा, या फिर श्री कृष्ण को अपनी ‘शस्त्र न उठाने’ की प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ेगी।” यह सीधे तौर पर भगवान को चुनौती देना था।
जब कमजोर पड़े अर्जुन
वेद व्यास रचित महाभारत के अनुसार, 9वें दिन भीष्म पितामह का रौद्र रूप देखकर पूरी पांडव सेना कांप उठी। उनके बाणों की वर्षा से पांडव सेना तिनकों की तरह बिखरने लगी। अर्जुन, अपने ही परदादा (भीष्म) पर प्रहार करने में संकोच कर रहे थे और पितामह के बाणों का जवाब नहीं दे पा रहे थे। स्थिति ऐसी हो गई कि लगा अब अर्जुन का अंत निश्चित है।
भक्त के लिए भगवान का समर्पण
जब श्री कृष्ण ने देखा कि अर्जुन का रथ टूटने वाला है और भीष्म उन्हें मारने ही वाले हैं, तो उनसे रहा नहीं गया। वे रथ से कूद पड़े। क्रोध में उन्होंने पास पड़े एक टूटे हुए रथ का पहिया उठा लिया और उसे ही ‘सुदर्शन चक्र’ की तरह धारण कर भीष्म की ओर दौड़े।
यह दृश्य देखकर भीष्म ने अपने हाथ जोड़ लिए। श्रीमद्भागवत और संत वाणियों में कहा गया है कि भीष्म यही चाहते थे। वे देखना चाहते थे कि कृष्ण के लिए अपना वचन बड़ा है या अपना भक्त। अर्जुन ने कृष्ण के पैर पकड़कर उन्हें रोका और शांत किया। लेकिन, भगवान ने उस दिन यह साबित कर दिया कि जब बात उनके भक्त की रक्षा की आती है, तो वे अपनी बड़ी से बड़ी प्रतिज्ञा भी तोड़ सकते हैं। कृष्ण का नियम तोड़ना, भीष्म की भक्ति और अर्जुन के प्रति उनके प्रेम की सबसे बड़ी जीत थी।
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