पश्चिम एशिया में अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब चिकित्सा क्षेत्र तक पहुंच गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजरानी बाधित होने और कतर में एलएनजी उत्पादन घटने से दुनिया में हीलियम की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
यही हीलियम एमआरआई मशीनों, सेमीकंडक्टर निर्माण और कई उच्च तकनीकी उद्योगों के लिए अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संकट लंबा ¨खचा तो कई देशों में एमआरआइ जांच की प्रतीक्षा अवधि बढ़ सकती है।
कतर दुनिया का बड़ा हीलियम उत्पादक है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में वहां लगभग 6.3 करोड़ घनमीटर हीलियम का उत्पादन हुआ, जो वैश्विक उत्पादन का लगभग एक-तिहाई है। कतर से निकलने वाला लगभग पूरा हीलियम समुद्री मार्ग से होर्मुज जलडमरूमध्य होकर दुनिया तक पहुंचता है। यही कारण है कि वहां जहाजों की आवाजाही धीमी पड़ते ही सप्लाई पर सीधा असर पड़ा।
हीलियम एलएनजी उत्पादन का सह-उत्पाद है। कतर के रस लाफान और मेसाईद ऊर्जा परिसरों पर हमलों के बाद कतरएनर्जी ने एलएनजी उत्पादन घटाया।
कंपनी के अनुसार इससे तरल हीलियम निर्यात में 14 प्रतिशत कमी आएगी। एलएनजी उत्पादन में गिरावट का मतलब है हीलियम की उपलब्धता भी कम होना।
हीलियम ऐसा तत्व है जिसे अत्यंत निम्न तापमान तक ठंडा किया जा सकता है। इसी वजह से यह एमआरआई मशीनों के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट ठंडे रखने में उपयोग होता है। बिना हीलियम के एमआरआई मशीनें स्पष्ट इमेज नहीं दे सकतीं। दुनिया में उपयोग होने वाले हीलियम का लगभग चौथाई हिस्सा केवल चिकित्सा क्षेत्र में जाता है।
हीलियम की कमी से केवल अस्पताल ही नहीं, चिप निर्माण उद्योग भी प्रभावित होगा। सेमीकंडक्टर उत्पादन में हीलियम शुद्ध शीतलक गैस के रूप में काम करता है। दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और चीन जैसे देश कतर से आने वाली आपूर्ति पर काफी निर्भर हैं।
बाजार विश्लेषकों के अनुसार यदि आपूर्ति बाधा 30 दिन चली तो कीमतें 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। यदि संकट 60 से 90 दिन तक जारी रहा तो वृद्धि 25 से 50 प्रतिशत तक जा सकती है। जिन खरीदारों के पास दीर्घकालिक अनुबंध नहीं हैं, उन पर सबसे अधिक दबाव पड़ेगा।
2006 के बाद पांचवीं बार हीलियम संकट से जूझ रही दुनिया
अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हीलियम उत्पादक है, लेकिन अतिरिक्त आपूर्ति तुरंत बढ़ाना आसान नहीं है। कुछ कंपनियां यूरोप और उत्तर अमेरिका से आपूर्ति पुनर्व्यवस्थित कर रही हैं। हालांकि फिलहाल अधिकांश एमआरआई मशीनें तरल हीलियम पर ही निर्भर हैं।
2006 के बाद यह पांचवीं बार है जब दुनिया हीलियम संकट का सामना कर रही है। कुछ देशों ने हीलियम-फ्री या हीलियम-रिसाइ¨क्लग एमआरआइ तकनीक विकसित की है, लेकिन उसका व्यापक उपयोग अभी नहीं हो पाया है।
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