भारत ने 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने के लिए पहला कदम आगे बढ़ाया है, लेकिन रूस के सुखोई-57 को शामिल करने का विकल्प अभी भी खुला है। राफेल तात्कालिक जरूरतों के लिए चुना गया है, जबकि सुखोई-57 भविष्य की उच्च-तीव्रता वाले युद्धों के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। इस मामले पर विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं, पढ़िए रिपोर्ट-
फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की दिशा में पहला कदम बढ़ने के बावजूद रूस के सुखोई-57 को शामिल करने का विकल्प अभी भी खुला है। रक्षा मंत्रालय से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि राफेल प्रस्ताव को मंजूरी मिलने का यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि सुखोई-57 को लेकर विचार समाप्त हो गया है। सरकार इस विकल्प पर अब भी मंथन कर रही है।
सूत्रों के अनुसार, राफेल और सुखोई-57 की भूमिका और उद्देश्य अलग-अलग हैं। राफेल एक अत्याधुनिक 4.5 पीढ़ी का मल्टीरोल लड़ाकू विमान है, जिसे भारतीय वायुसेना की घटती स्क्वॉड्रन संख्या को तेजी से पूरा करने और तात्कालिक परिचालन जरूरतों के लिए चुना जा रहा है। इसके विपरीत, सुखोई-57 पांचवीं पीढ़ी का स्टेल्थ फाइटर जेट है, जिसे भविष्य की उच्च तीव्रता वाली लड़ाइयों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है।
फिलहाल वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों की केवल 29 स्क्वॉड्रन बची हैं, जबकि दोतरफा युद्ध की चुनौती को देखते हुए 42 स्क्वॉड्रन की जरूरत मानी जाती है। राफेल सौदा इसी तत्काल संकट से निपटने के लिए आगे बढ़ाया गया है। पहले से सेवा में होने के कारण इसके इंडक्शन की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज हो सकती है। सुखोई-57 को दीर्घकालिक रणनीतिक तैयारी के नजरिए से उपयोगी माना जा रहा है। ऐसे में भारत सीमित संख्या में इसकी कुछ स्क्वॉड्रन शामिल करने पर विचार कर सकता है।
राफेल और सुखोई-57 की क्षमताओं में अंतर
राफेल अपनी बहुउद्देश्यीय क्षमता, भरोसेमंद एवियोनिक्स, आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और सटीक हथियार प्रणालियों के लिए जाना जाता है। यह हवा से हवा, हवा से जमीन और परमाणु डिलीवरी जैसी कई भूमिकाएं निभाने में सक्षम है, जिससे मौजूदा हालात में यह बेहद प्रभावी साबित होता है। वहीं, सुखोई-57 अपनी विशिष्ट पांचवीं पीढ़ी की क्षमताओं के कारण अहम माना जा रहा है। स्टेल्थ डिजाइन, सुपरक्रूज क्षमता, अत्याधुनिक सेंसर फ्यूजन, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और एआई आधारित प्रणालियों से लैस यह विमान दुश्मन के एयर डिफेंस नेटवर्क में गहराई तक घुसकर हमला करने और बिना पकड़े वापस लौटने की क्षमता रखता है। चीन जैसे देशों द्वारा पांचवीं पीढ़ी के स्टेल्थ विमानों की तैनाती के बीच इन क्षमताओं को सामरिक संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञ बोले-114 राफेल की डील जल्द पूरी की जानी चाहिए
रक्षा मामलों के विशेषज्ञ और सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज के पूर्व महानिदेशक एयर मार्शल अनिल चोपड़ा का कहना है कि सामरिक जरूरतों को देखते हुए 114 राफेल की डील जल्द पूरी की जानी चाहिए। साथ ही रूस से सुखोई-57 की कुछ स्क्वॉड्रन लेने पर भी विचार हो सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के एडवांस मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमका) कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए सुखोई-57 का देश में निर्माण नहीं किया जाना चाहिए।
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