दक्षिणी दिल्ली के सैदुल्लाजाब में इमारत ढहने की घटना ने एक बार फिर एमसीडी के बिल्डिंग विभाग की कार्यप्रणाली और अवैध निर्माण पर नियंत्रण की व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया है। राजधानी में जब भी किसी इमारत के गिरने या अवैध निर्माण से जुड़ा हादसा सामने आता है, कुछ दिनों तक विभागीय कार्रवाई, जांच और जवाबदेही की चर्चा होती है। संबंधित क्षेत्र के इंजीनियरों पर कार्रवाई भी होती है, लेकिन समय बीतने के साथ मामला ठंडा पड़ जाता है और अवैध निर्माण का सिलसिला फिर जारी रहता है।
एमसीडी के बिल्डिंग विभाग की जिम्मेदारी निर्माण गतिविधियों की निगरानी, अवैध निर्माण की पहचान और नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई करना है। विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि किसी भी इलाके में निर्माण शुरू होते ही इसकी जानकारी स्थानीय स्तर पर विभाग तक पहुंच जाती है। बेलदार, जूनियर इंजीनियर और अन्य कर्मचारी मौके का निरीक्षण भी करते हैं। इसके बावजूद कई मामलों में निर्माण कार्य बिना रोक-टोक जारी रहता है और पूरी इमारत खड़ी हो जाती है।
हादसों के बाद विभागीय अधिकारी अक्सर यह दलील देते हैं कि संबंधित भवन को रिकॉर्ड में ‘बुक’ किया गया था और नियमानुसार नोटिस जारी किए गए थे। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यदि निर्माण को अवैध माना गया था, तो उसे शुरुआती चरण में रोकने या ध्वस्त करने की प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यही वजह है कि हर हादसे के बाद केवल निचले स्तर के अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठते हैं।
तीन साल से अधिक बिल्डिंग विभाग में नहीं रखे जा सकते इंजीनियर…फिर कैसे सब चलता रहता है
एमसीडी के भीतर बिल्डिंग विभाग को सबसे संवेदनशील और प्रभावशाली विभागों में माना जाता है। सूत्रों के अनुसार, बेलदार से लेकर अधिशासी अभियंता तक की पोस्टिंग को लेकर हमेशा खींचतान रहती है। नियमों के मुताबिक किसी इंजीनियर को तीन वर्ष से अधिक समय तक बिल्डिंग विभाग में नहीं रखा जा सकता और चार्जशीट वाले अधिकारियों की नियुक्ति भी नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद लंबे समय तक तैनाती और तबादले के बाद दोबारा पोस्टिंग के आरोप समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता
एमसीडी सदन और विभिन्न समितियों की बैठकों में अवैध निर्माण लगातार चर्चा का विषय रहा है। भ्रष्टाचार और विभागीय कर्मचारियों की गिरफ्तारी के मामलों ने भी विभाग की छवि पर सवाल खड़े किए हैं। सैदुल्लाजाब हादसे के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि अवैध निर्माण की जिम्मेदारी केवल क्षेत्रीय इंजीनियरों तक सीमित है या फिर पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है। सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है-यदि निर्माण की जानकारी पहले से थी, तो उसे समय रहते रोका क्यों नहीं गया?
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