नदी संरक्षण दिवस: आज अस्तित्व के लिए तरस रहीं जीवनदायिनी नदियां, अंधाधुंध शहरीकरण ने छीना इंदौर का जल वैभ

एक समय इंदौर की पहचान रही नदियां आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। नदी संरक्षण दिवस पर यह सवाल फिर सामने खड़ा है कि कभी जीवनदायिनी रही ये नदियां अब प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण नालों में क्यों बदलती जा रही हैं?

देश में शहरों का विकास जिस तरह नदियों के किनारों पर हुआ ठीक उसी प्रकार मालवा में इंदौर की बसाहट और विकास भी नदी के किनारे ही हुआ। दुखद पहलू यह है कि नगरीकरण के विस्तार ने इन्हीं नदियों को प्रदूषित कर नालों में तब्दील कर दिया। नगर हो या गांव सभी स्थानों पर गंदा पानी नदियों में मिल रहा है, कई उद्योगों का प्रदूषित पानी भी इन नदियों के अस्तित्व को खत्म करने में पीछे नहीं रहा।

इंदौर नगर का सौभाग्य है कि आसपास से कई नदियों का उद्गम स्थल हैं। चंबल जानापाव की पहाड़ी से, क्षिप्रा नदी इंदौर नगर से 11 किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व में देवगुराड़िया और केवड़ेश्वर के समीप स्थित ककरी-बरडी पहाड़ी से निकली है। खान (कान्ह) खंडवा रोड स्थित उमरिया के समीप पहाड़ी से, गंभीर नदी जानापाव की पहाड़ी से और चोरल नदी छोटा जाम के समीप से निकली है। इसमें खान (कान्ह) और इसकी सहायक नदी सरस्वती किसी समय इंदौर नगर की जीवनधारा हुआ करती थी, परंतु आज ये नदियां गंदे नालों में बदल गई हैं। रियासत काल में इन्ही नदियों में नावें चलती थीं और हाथी नहाया करते थे।

नगर की नदियां कब साफ होंगी?
इंदौर के मध्य भाग में बहने वाली नदियों को साफ करने की कवायद काफी समय से जारी है पर यह कार्य अभी तक नहीं हो पाया है। शहर में नदियों के शुद्धिकरण की कार्ययोजना का शुभारंभ कृष्णपुरा पुल के नीचे से 26 मार्च 1992 को हुआ था। इसका मकसद कान्ह और सरस्वती नदी को साफ करना था। करीब 35 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह कवायद जारी है। इससे पूर्व भी प्रदेश तत्कालीन आवास एवं पर्यावरण राज्यंत्री महेश जोशी ने नवंबर 1985 में इन नदियों के शुद्धिकरण की योजना बनाई थी। कई योजनाएं बनती रहीं पर ये आज तक अशुद्ध ही हैं।

नदियां और तालाब खोते जा रहे
इंदौर की नदियों को साफ करने के नाम पर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत रिवर फ्रंट डेवलपमेंट, नाला टैपिंग आदि कई योजनाएं को शुरू किया गया। नदियों के किनारे सड़कें निर्मित कर दी गईं। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि भविष्य में जब नगर में अधिक बारिश होगी तो पानी के निकास का समुचित स्थान नहीं होने से बाढ़ की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। 1918 में प्रसिद्ध नगर नियोजक पेट्रिक गिडीज द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में इंदौर के कई तालाबों और नदियों का जिक्र किया गया था, अब उनके जलग्रहण क्षेत्रों में तेजी से कॉलोनियों की बसाहट हो गई है, इसके कारण वर्षाकाल में ये लबालब हो ही नहीं पा रहे हैं।

2000 करोड़ रुपये खर्च फिर भी साफ नहीं हुई कान्ह और सरस्वती
समाजसेवी किशोर कोडवानी नगर की नदियों की सफाई के लिए लंबे समय से प्रयास कर रहे हैं। उनके अनुसार इंदौर ऐसा शहर था, जहां सर्वाधिक नदियां थीं लेकिन ये सब धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। इन नदियों के रास्ते रोककर कॉलोनी बना दी गई, इसका नतीजा शहर को तेज बारिश के समय भुगतना पड़ता है। इन नदियों की सफाई के लिए कागजी योजनाएं खूब बनाई गईं। एक अनुमान के अनुसार नगर की इन नदियों की साफ-सफाई और अन्य मदों में करीब 2000 करोड रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन अभी तक नदियां नाले के रूप में ही हैं। क्या भविष्य में ये साफ हो पाएंगी? यह किसी कल्पना जैसा लगता है।

इंदौर की नदियों से जुड़े कुछ रोचक तथ्य
1913 और 1928, 1979 में कान्ह (खान) नदी में भीषण बाढ़ से इंदौर नगर को काफी क्षति हुई थी। कई पुल बह गए थे। कृष्णपुरा से तोपखाने की ओर जाने के लिए हाथियों का सहारा लिया गया था।
इंदौर नगर में 21.3 किलोमीटर लंबी कान्ह और 12.4 किमी लंबी सरस्वती नदी प्रवाहित होती है। इसके अतिरिक्त अन्य लघु नदियां भी हैं।
किसी समय इन नदियों में स्वच्छ पानी बहता था, राजवाड़ा के आसपास की प्राचीन बस्तियों के लिए लोग यहीं से पीने का पानी ले जाते थे और इनमें स्नान करते थे।
इन नदियों के समीप या किनारे पर रेसीडेंसी कोठी, लालबाग, कृष्णपुरा की छत्री, छत्रीबाग की छत्रियां और कई मंदिर थे।
मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया की तर्ज पर कृष्णपुरा के समीप बोझांकेट मार्केट (वीर सावरकर मार्केट) निर्मित किया गया था।

इसलिए मनाया जाता है नदी दिवस
नदियों के संरक्षण के लिए प्रतिवर्ष 14 मार्च को उनके महत्व, संरक्षण, प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता लाने के लिए विश्व भर में नदी दिवस मनाया जाता है। इस दिवस की शुरुआत 1998 से हुई थी। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य आमजन में नदियों के प्रति स्नेह भाव जागृत करना भी है।

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