चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन करें इस कथा का पाठ

चैत्र नवरात्र का पावन पर्व बेहद शुभ माना जाता है। यह दिन मां दुर्गा के सबसे पराक्रमी और कल्याणकारी स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा के लिए समर्पित है। मां चंद्रघंटा साहस, वीरता और शांति का प्रतीक हैं। उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है, जिसकी ध्वनि से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है।

ऐसी मान्यता है कि नवरात्र के तीसरे दिन जो भक्त मां चंद्रघंटा की पौराणिक कथा का पाठ करते हैं, उनके जीवन से न केवल मानसिक तनाव दूर होता है, बल्कि जन्म-जन्मांतर के दुखों का भी अंत हो जाता है, तो आइए मां चंद्रघंटा की कथा का पाठ करते हैं, जो इस प्रकार हैं –

मां चंद्रघंटा का स्वरूप
देवी भागवत पुराण के अनुसार, मां चंद्रघंटा का शरीर सोने के समान चमकीला है। उनके दस हाथ हैं, जिनमें वे धनुष, बाण, तलवार, त्रिशूल और गदा जैसे अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। वे सिंह (शेर) पर सवार हैं, जो साहस का प्रतीक है। मां का यह रूप हमें सिखाता है कि शांत रहते हुए भी अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

मां चंद्रघंटा की कथा (Chaitra Navratri 2026 3rd Day Katha)
प्राचीन काल में देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक भीषण युद्ध चला। असुरों का राजा महिषासुर बेहद शक्तिशाली और अहंकारी हो गया था। उसने देवताओं के राजा इंद्र का सिंहासन छीन लिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार जमा लिया। सभी देवता इस संकट से बचने के लिए त्रिदेवों की शरण में गए। देवताओं की परेशानी सुनकर त्रिदेव बहुत क्रोधित हुए। उनके क्रोध से एक दिव्य ऊर्जा उत्पन्न हुई, जिससे मां दुर्गा प्रकट हुईं। इसके बाद सभी देवताओं ने देवी को अपने अस्त्र-शस्त्र भेंट किए, तब मां ने ‘चंद्रघंटा’ का अवतार लिया। युद्ध के मैदान में जब मां चंद्रघंटा ने अपने घंटे की भयानक ध्वनि की, तो उसकी गूंज से ही आधे से ज्यादा असुर मारे गए।

महिषासुर के सेनापतियों ने मां पर हमला किया, लेकिन देवी ने पलक झपकते ही उनका संहार कर दिया। अंत में मां ने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया और स्वर्ग का वैभव वापस दिलाया।

पूजन मंत्र
“पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥”

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