पुराने समय में होली का उत्सव आज की तुलना में बहुत अलग और प्राकृतिक होता था। इस साल 3 मार्च 2026 को रंगों वाली होली का पर्व मनाया जाएगा, जिसे लेकर लोगों में विशेष उत्साह है। आज जब हम रसायन भरे रंगों का उपयोग करते हैं, तो अक्सर हम पूर्वजों की उन सुंदर परंपराओं को भूल जाते हैं जो पूरी तरह से प्रकृति पर आधारित थीं। एक समय था जब होली खेलने के लिए पलाश या टेसू के फूलों का ही मुख्य रूप से उपयोग किया जाता था।
ये फूल न केवल देखने में सुंदर होते हैं, बल्कि इनके रंग से बनी होली स्वास्थ्य के लिए भी एक वरदान की तरह काम करती थी। आइए जानते हैं कि टेसू के फूलों से होली खेलने की परंपरा कब और कैसे शुरू हुई और इसके पीछे छिपे ज्ञान और वैज्ञानिक कारणों के बारे में पूरी जानकारी।
प्राचीन परंपरा और टेसू के फूलों का ऐतिहासिक महत्व
इतिहास और पौराणिक कथाओं के अनुसार, ब्रज की होली में टेसू के फूलों का महत्व सबसे अधिक रहा है। भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के समय में इन फूलों को पानी में उबालकर सुंदर केसरिया रंग तैयार किया जाता था। वसंत ऋतु के आते ही जब जंगलों में ये फूल खिलते थे, तब गांव के लोग इन्हें इकट्ठा करके सुखा लेते थे। उस दौर में रंग बनाने के लिए किसी रसायनिक विधि का सहारा नहीं लिया जाता था। हमारे ग्रंथों में भी उल्लेख मिलता है कि फूलों से बनी होली मन की सहजता और प्रेम को बढ़ाने वाली होती थी।
पुराने समय में इन फूलों का रंग बहुत गहरा होता था, जो त्वचा को प्राकृतिक निखार देने की शक्ति रखता था। ब्रज की गलियों में टेसू के फूलों की वह खुशबू और परंपरा के प्रति सम्मान आज भी याद किया जाता है।
वैज्ञानिक आधार और शरीर पर पड़ने वाले सुखद प्रभाव
टेसू के फूलों से होली खेलने के पीछे केवल धार्मिक कारण ही नहीं, बल्कि गहरा वैज्ञानिक आधार भी रहा है। वसंत के मौसम में जब वातावरण बदलता है, तो शरीर में चर्म रोगों या संक्रमण होने की आशंका बढ़ जाती है। पलाश के फूलों में ऐसे प्राकृतिक गुण होते हैं जो त्वचा की समस्याओं को दूर करने में मदद करते हैं। जब इन फूलों से बने रंगों से होली खेली जाती थी, तो वह शरीर के लिए किसी औषधि की तरह काम करता था।
हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग हमेशा इसी प्राकृतिक तरीके को अपनाने की सलाह देते थे ताकि त्योहार का आनंद भी बना रहे और सेहत को भी कोई नुकसान न हो। इन फूलों के पानी से स्नान करने से मानसिक शांति मिलती है और यह शरीर को रोगों से लड़ने की शक्ति भी देता है।
ब्रज का विशेष अनुभव और भक्ति का रंग
ब्रज की होली का अनुभव आज भी बहुत ही भावुक और सुंदर दृश्य दिखाता है। आज भी मथुरा-वृंदावन के कुछ मंदिरों में टेसू के फूलों का रंग बहुत ही श्रद्धा के साथ तैयार किया जाता है और बड़े-बड़े बर्तनों में भरकर भक्तों पर छिड़का जाता है। जब भक्त पूरी तरह से कान्हा के रंग में डूब जाते हैं, तो वह दृश्य देखने लायक होता है।
फूलों की भीनी-भीनी खुशबू और केसरिया रंग के बीच जब मंदिर के आंगन में भजन गूंजते हैं, तो मन को असीम शांति मिलती है। यह दृश्य हमें याद दिलाता है कि खुशियां मनाने के लिए हमें रसायनों की नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सच्चे जुड़ाव की आवश्यकता है।
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