उत्तराखंड: टिहरी बांध विस्थापितों को 19 साल में भी नहीं मिला छोटी सरकार चुनने का हक

प्रदेश में इन दिनों पंचायत चुनाव चल रहे हैं। कुछ दिन बाद लोकतंत्र की छोटी सरकार यानी पंचायतों का गठन भी हो जाएगा। मगर, एशिया के सबसे बड़े टिहरी बांध के लिए अपनी पुस्तैनी भूमि और पहचान खोने वाले बांध विस्थापितों को विस्थापन के 19 साल भी अपनी छोटी सरकार चुनने का अधिकार नहीं मिल पाया है।

ऋषिकेश के पशुलोक और श्यामपुर में विस्थापित हुए टिहरी बांध विस्थापितों को भूमि तो मिली, मगर अभी तक भूमिधरी का अधिकार नहीं मिल पाया। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में इन्हें सरकार चुनने का अधिकार है। विकास की सबसे अहम मानी जाने वाली पंचायत व्यवस्था में इनका अस्तित्व नहीं है। 

टिहरी बांध के लिए भागीरथी व भिलंगना घाटी के कई गांवों को वर्ष 2000 में ऋषिकेश के निकट पशुलोक और श्यामपुर में विस्थापित किया गया था। इनमें प्रमुख रूप से डोबरा, मालीदेवल, असेना, गोदी, सिराई, उप्पू, लंबपोंगड़ी, खांड गांव, बड़कोट, क्यारी व पेंदार्स आदि शामिल थे। 

अपने मूल स्थानों पर इन गांवों की करीब सात ग्राम पंचायतें अस्तित्व में थी। यहां इन गांवों के विस्थापितों को पशुलोक के निर्मल ब्लॉक ए, बी व सी तथा आमबाग, श्यामपुर के निकट श्यामपुर ए, बी व सी में विस्थापित किया गया था।

वर्ष 2002-03 में टिहरी बांध की झील भरने के साथ ही जैसे-जैसे इन गांवों ने जल समाधि ली। यहां के लोगों ने अपने विस्थापन क्षेत्रों में शिफ्ट होना शुरू कर दिया था। अब वर्तमान में करीब एक दर्जन गांवों के तीन हजार परिवारों की करीब बीस हजार की आबादी इस विस्थापित क्षेत्र में निवासरत है। 

डेढ़ दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी इन बांध विस्थापितों को अभी तक भूमिधरी का अधिकार नहीं मिल पाया है। विस्थापन के बदले मिली भूमि पर यह लोग निवासरत हैं और कृषि कर रहे हैं। मगर, वास्तव में इस भूमि पर इन लोगों का कोई मालिकाना हक ही नहीं है। 

विस्थापन शर्तों में स्पष्ट था कि जो सरकारी और ढांचागत सुविधाएं और उन्हें अपने गांवों में मिल रही थी, विस्थापित क्षेत्र में मिलेंगी। अभी तक विस्थापित गांवों को राजस्व का दर्जा तक नहीं मिल पाया और न ही यहां पंचायतों का ही पुनर्गठन किया गया। 

भूमिधरी का अधिकार न होने और अपनी ग्राम पंचायत न होने के कारण विस्थापितों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। सरकार की तमाम योजनाओं का लाभ भी यहां विस्थापितों को नहीं मिल पा रहा है। अपनी इन मांगों के लिए बांध विस्थापित आंदोलन भी कर चुके हैं, मगर अभी तक आश्वासन के सिवा कुछ भी नहीं मिल पाया।

यह आती हैं दिक्कतें

– अपनी ग्राम पंचायत न होने के कारण योजनाओं का लाभ नहीं मिलता।

– जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भी दूसरी ग्राम पंचायतों पर आश्रित रहना पड़ता है।

– समाज कल्याण की पेंशन योजनाओं का भी बांध विस्थापितों को लाभ नहीं।

– सरकारी नौकरियों की ज्वाइनिंग की स्थिति में आवश्यक प्रमाण पत्रों के लिए आती है दिक्कतें।

– बैंक खाते खोलने में भी दिक्कतों का करना पड़ता है सामना।

– अपनी भूमि होने के बावजूद भूमिधरी का अधिकार न होने से बैंक नहीं देता ऋण।

– किसी अन्य व्यक्ति के लिए बैंक गारंटर भी नहीं बन सकते विस्थापित। शासन में लंबित है राजस्व ग्राम का प्रस्ताव।

लगातार छल कर रही है सरकार 

विस्थापित समन्वय समिति के अध्यक्ष हरि सिंह भंडारी के अनुसार, बांध विस्थापितों के साथ सरकार लगातार छल कर रही है। हम कई वर्षों से अपनी जायज मांगों के लिए आंदोलन कर रहे हैं, मगर हर जगह से निराशा ही हाथ लगी है। 

उन्होंने बताया कि कुछ समय पूर्व राजस्व परिषद की बैठक में भी विस्थापित क्षेत्र को राजस्व ग्राम बनाए जाने पर चर्चा हुई थी, मगर इसका भी कोई नतीजा अब तक सामने नहीं आ पाया है। यही रवैया रहा तो विस्थापितों को अब न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को विवश होना पड़ेगा। 

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