कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने एक ऐसे इंसान को नौकरी पर रखा है, जिसने कभी प्रतिबंधित इस्लामी आतंकी संगठन हिज्ब-उत-तहरीर का समर्थन किया था, पश्चिमी शिक्षा को मुसलमानों के लिए खतरा बताया था और लोकतंत्र की आलोचना की थी।
फराह अहमद कैम्ब्रिज में फैकल्टी ऑफ एजुकेशन में असिस्टेंट रिसर्च प्रोफेसर हैं। यह वही फैकल्टी है जहां जेसन अर्डे भी थे। वही विवादित अश्वेत प्रोफेसर जिन पर साहित्यिक चोरी के आरोप लगे थे और उन्होंने हाल ही में नौकरी छोड़ दी।
‘पश्चिमी शिक्षा एक खतरा’
हिज्ब-उत-तहरीर एक अंतरराष्ट्रीय सुन्नी आतंकी संगठन है, जिसका मकसद इस्लामिक कानून के तहत चलने वाली खिलाफत कायम करना है। ब्रिटेन में इस संगठन पर प्रतिबंध लगा हुआ है।
अहमद को पिछले साल पोस्टग्रेजुएट रिसर्च और अंडरग्रेजुएट छात्रों को पढ़ाने की जिम्मेदारी वाला पद सौंपा गया था। उन्होंने 2002 में हिज्ब-उत-तहरीर के एक पैम्फलेट एजुकेशन एंड आइडेंटिटी में एक चैप्टर लिखा था। स्पेक्टेटर को मिले इस पैम्फलेट को 2017 में दोबारा छापा गया था। इसमें कहा गया था कि ब्रिटेन में मुस्लिम समुदाय को यह समझने की जरूरत है कि पश्चिमी शिक्षा हमारी मान्यताओं और मूल्यों के लिए खतरा है।
‘लोकतंत्र एक भ्रष्ट परंपरा है’
उन्होंने स्कूलों की ओर से मुस्लिम बच्चों को मुख्यधारा में शामिल करने की कोशिशों की आलोचना करते हुए कहा कि इनका मकसद ऐसी नई पीढ़ियां तैयार करना है जो इस्लाम को नकार दें… अगर समाज कुफ्र (अविश्वास) पर आधारित है तो एक समुदाय के तौर पर इस चुनौती का सामना करना हमारा फर्ज है ताकि हम अपनी युवा पीढ़ी को इसकी बुराइयों से बचा सकें। उन्होंने लिखा कि लोकतंत्र एक भ्रष्ट परंपरा है।
उन्होंने ब्रिटिश स्कूलों की आलोचना की क्योंकि फराह के मुताबिक ये स्कूल सिखाते हैं कि बाल विवाह और बहुविवाह गलत हैं और इस्लाम की अहमियत को हिंदू धर्म, सिख धर्म और इसी तरह के दूसरे धर्मों के बराबर मानते हैं।
उन्होंने लिखा कि विज्ञान, परियों की कहानियां और रोमियो-जूलियट जैसी चीजें समस्याएं हैं क्योंकि मुस्लिम बच्चों के सामने ऐसे विचार आएंगे जो इस्लाम के खिलाफ हैं। 2010 में उन्होंने कहा कि अब वह हिज्ब-उत-तहरीर की सदस्य नहीं हैं।
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