देश को आजाद हुए 7 दशक से अधिक का समय बीत चुका है. लेकिन हरियाणा के भिवानी जिले का रोहनात और सोनीपत जिले का लिवासपुर गांव आज भी खुद को पूरी तरह आजाद महसूस नहीं करते। यह भाबना किसी कानूनी गुलामी की नहीं, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेजों द्वारा किए गए ऐतिहासिक अत्याचार और आजादी के बाद लगातार हुई सख्तारी उपेक्षा से उपजी है।
नीलामी का कलंक
14 सितम्बर 1857 की अंग्रेजों ने रोहनात को ‘बागी गांव घोषित किया। 13 नवम्बर की पूरे गांव की नीलामी का आदेश जारी हुआ और 20 जुलाई 1858 की 20,656 बीघा जमीन और मकान महज 8,000 रुपार में नीलाम कर दिए गए। फरमान जारी किया गया कि वह जमीन भविष्य में रोहनात के लोगों को नहीं चेची जाएगी।ग्रामीणों ने वर्षों बाद रिश्तेदारों के नाम में जमीन खरीदकर गांव दोवारा बसाया, लेकिन पैतृक भूमि आज तक वापस नहीं मिली। इसी पीड़ा के चलते वर्षों तक ग्रामीणों ने स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर तिरंगा नहीं फहराया। वर्ष 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा यहां तिरंगा फहराया गया था।
रोहनातः 1857 की क्रांति का केंद्र
भिवानी जिले का रोहनात गांग 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हरियाणा की ओर से सबसे बड़े बलिदान के लिए जाना जाता है। 29 मई 1857 की बहादुरशाह जाफर के आदेश पर अग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। ग्रामीणों ने जेले तोड़कर कैदियों को आजाद कराया और हिसार व हासी में कुल 23 अंग्रेज अफसरों को मार गिराया। इससे बौखलाकर अंग्रेजी ने छुट्टी गाव के पास तीपे तैनात कर दें। सैकडों ग्रामीणों को जलाकर मार डाला गया, महिलाओं और बच्चों को कुओं में फैका गया और दर्जनों लोगों को सरेआम फांसी दी गई। हांसी की जिस सड़क पर क्रांतिकारियों को कुचला गया, वह आज भी लाल सड़क के नाम से जानी जाती है।
सीनीपत जिले का लिवासपुर गांव भी 1857 की क्रांति का साक्षी रहा । यहां के नंबरवार उदमी राम ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला। एक अंग्रेज अधिकारी पर हमला करने के बाद भी उन्होंने उसकी पत्नी को सुरक्षित पडोसी गाव भालगढ़ पहुंचा दिया। मुखबिरी के बाद अग्रेजी ने उदमी राम और उनकी पत्नी रत्नी देवी को पकड़ लिया। दोनों को पीपल के पेड़ पर कीलों से ठोक दिया गया । उनके साथियों को बहालगढ़ चौक पर पत्थर के कोल्ह के नीचे रौंदकर मार दिया गया । उसी कोल्हूका पाचन आज भी सोनीपत के ताऊ देवी लाल पार्क में स्मृति चिन्ह के रूप में मौजूद है।
आज भी वही सवाल
रोहनात और लिवासपुर भारत की संप्रभुता का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन यहां गुलामी शब्द जमीनों की वापसी न होना, शहीदी को आधिकारिक दर्जा न मिलना और ऐतिहासिक अन्याय की अनदेखी का प्रतीक बनचुका है।
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