Saturday , 4 December 2021

पहले घटिया स्मार्ट मीटर खरीदे अब कोरोनाकाल में बिजली उपभोक्ताओं के विश्वास से खिलवाड़ की तैयारी

  • इन्ही बिजली अफसरों ने पहले पीएफ डुबोया, अब चुनाव से पहले यूपी की बिजली राजस्व प्रणाली चौपट करने की साज़िश
  • अरबों के नए बिजली घोटाले की तरफ बढ़ रहा पावर कार्पोरेशन

लखनऊ. यूपी पावर कार्पोरेशन के अफसरों के कारण हजारों बिजलीकर्मियों का पीएफ डीएचएफएल में डूब गया। हजारों करोड़ की तगड़ी चपत के बावजूद बिजली विभाग के बड़े अफसरों की नींद नहीं खुली। अब यही अफसर विधानसभा चुनाव के करीब अरबों रूपया एकल रेवेन्यू मैनजेमेंट सिस्टम(बिलिंग सिस्टम) पर खर्च करने पर आमादा हैं। जबकि इस प्रणाली को कोरोनाकाल में लागू करना न सिर्फ घाटे का सौदा है बल्कि आम उपभोक्ताओं के हितों से खिलवाड़ भी है। जबकि स्मार्ट मीटर सिस्टम तक पहले ही फेल हो। मुख्यमंत्री योगी को तत्काल अफसरों की इस कारगुजारी का संज्ञान लेकर जांच करानी चाहिए।

वर्ष 2018 में केंद्र सरकार की नोडल एजेंसी ने भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय में शहरी उत्तर प्रदेश के 40 लाख परिवारों के लिए स्मार्ट मीटर परियोजना को लागू करने के लिए उत्तर प्रदेश के साथ अनुबंध किया था। लेकिन गत वर्ष 14 अगस्त यूपीपीसीएल के सारे दावे धराशायी हो गए। जन्माष्टमी समारोह के दौरान बिजली गुल हो गई और डेढ़ लाख उपभोक्ताओं के घरेलू स्मार्ट मीटर ने काम करना बंद कर दिया। मीटरों ने एक कमांड दिखाना शुरू कर दिया। खुद ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा ने जांच के आदेश दिए थे। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी विशेष टास्क फोर्स को नियुक्त करने का आदेश दिया जो स्मार्ट मीटर के फेल होने की जांच करती।  

उत्तर प्रदेश सरकार ने सिस्टम के स्थिर होने तक स्मार्ट मीटरिंग रोलआउट पर रोक लगाने का आदेश दिया था। इस घटना के एक साल बाद भी विभाग को ईईएसएल से अभी तक समस्या का स्पष्ट जवाब तक नहीं मिल पाया है ताकि स्मार्ट मीटरिंग को दोबारा शुरू किया। आखिर पुरे उत्तरप्रदेश में हुए इस ब्लैकआउट के लिए कौन जिम्मेदार था। अभी तक बिजली विभाग को पिछली गलतियों का दंड भी नहीं मिला था कि विभाग ने एक नए जोखिम भरे सफर का ऐलान कर दिया कि पूरे राज्य के लिए नए एकल आरएमएस (बिलिंग सिस्टम) विक्रेता की नियुक्ति की जाए। लगातार कई असफल प्रयासों के बावजूद इस नए नए एकल आरएमएस (बिलिंग सिस्टम) को आगे बढ़ाने की कोशिश अफसर लगातार कर रहे है। करीब एक दशक पहले केंद्र सरकार ने शहरी क्षेत्रों में बिलिंग सॉफ्टवेयर स्थापित करने के लिए अनुदान दिया था।

इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल शहरी यूपी में करीब 70 लाख उपभोक्ता करते हैं। स्थापना के दूसरे चरण में ग्रामीण यूपी के क्षेत्रों में एक और बिलिंग सॉफ्टवेयर स्थापित किया गया था जिसमें 3 करोड़ में सेकरीब सवा दो करोड़ उपभोक्ता इस प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश को वर्तमान प्रणाली को स्थापित करने में 4 से 5 साल लग गए थे। जबकि यूपीपीसीएल एक नई बिलिंग प्रणाली नियुक्त करने की योजना बना रहा है। विधानसभा चुनाव के करीब यह एक विनाशकारी कदम होना तय है  क्योंकि बड़े उपयोगिता बिलिंग सिस्टम में अक्सर प्रक्रिया संक्रमण, कार्यात्मक देरी, उत्पादकता और लाभप्रदता का एक बड़े नुकसान के उच्च जोखिम शामिल होते हैं। बिलिंग सॉफ़्टवेयर को बदलने के बजाय सिर्फ संशोधित करने की आवश्यकता है। बिजली अफसरों को अंदेशा ये भी है कि महामारी के दौरान अनावश्यक रूप से अरबों रुपया खर्च करने पर आम जनता में सरकार के खिलाफ गलत सन्देश भी जा सकता है।

दस्तावेजों के अनुसार पहले अज्ञात कारणों से निविदा दो बार रद्द की गई थी। अब विचाराधीन नए निविदा दस्तावेज में तीन बोलीदाता हैं संभावना ये भी है कि इन तीन बोलीदाताओं में से एक को निविदा मानदंड में गंभीर कमियों के कारण अयोग्य घोषित किया जा सकता है। इनमें से दो बोलीदाताओं ने बोली की अर्हता प्राप्त करने के लिए एक ही परियोजना अनुभव का उपयोग करने का दावा किया है। जो अपने आप में एक विवादास्पद मुद्दा है। दूसरी ओर यूपीपीसीएल के पिछले असफल प्रयासों के बावजूद लगातार प्रयास किया जा रहा है कि इन तीन बोलीदाताओं में से एक का चयन कैसे भी कर दिया जाए। जिसके बाद बिजली विभाग के अफसर न सिर्फ मुख्यमंत्री की छवि संग खिलवाड़ करेंगे बल्कि सरकार की फजीहत भी विपक्ष के लिए मुद्दा बनेगी। पिछले दो वर्षों के दौरान यह तीसरी बार है जब यूपीपीसीएल एकीकृत आरएमएस को लागू करने की कोशिश कर रहा है।

पहले अज्ञात कारणों से खारिज कर दिया गया था। इस प्रक्रिया को समाप्त करने के कुछ तार्किक कारण दिए गए थे। यदि यह आरएफपी इस समय किसी बोली लगाने वाले को प्रदान किया जाता है तो इस प्रक्रिया के कार्यान्वयन और सत्यापन को पूरा करने में लगभग 2-3 साल लगेंगे और सिस्टम को स्थिर करने के लिए और 2-3 साल लग जाएंगे। जिससे अरबों रुपयों का निवेश न सिर्फ बेनतीजा होगा बल्कि बाद भी भारी बजट फिर कंपनियों की लापरवाही के कारण अतिरिक्त लगाना पड़ेगा ख़ास बात ये है कि तीन बोलीदाता भी स्पष्ट रूप से अर्हता प्राप्त नहीं कर रहे हैं हड़बड़ाहट के इस टेंडर में योग्यता मानदंड और वैधता दोनों के साथ खिलवाड़ पक्का है।  

सभी बोलीदाताओं के पास कुछ बड़ी खामियां और अंतराल हैं जो निविदा देने में समस्या पैदा कर सकते हैं और बदले में यूपीपीसीएल और बोलीदाताओं के लिए कई विवाद पैदा कर सकते हैं। फिलहाल राजस्व प्रबंधन प्रणाली को किसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता नहीं है। यूपीपीसीएल यूपी के लिए एकल राजस्व प्रणाली को लागू करने पर इतना ध्यान क्यों केंद्रित कर रहा है। कार्पोरेशन में अफसरों का एक सिंडिकेट इसके लिए जिम्मेदार है। जो पहले भी कंपनियों के साथ मिलीभगत करके कई घोटालों की नींव रख चुका है। पीएफ घोटाले को विपक्ष ने मुद्दा बनाते हुए योगी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी की थी। मुख्यमंत्री योगी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस नीति के तहत सीबीआई जांच की सिफारिश की। जबकि घोटाला पिछली सपा सरकार में शुरू हुआ था। अब बिजली महकमें के अफसर चुनाव के पहले एक बार फिर घोटाले की नींव रखकर योगी सरकार के खिलाफ माहौल बनाकर विपक्ष को बैठे बिठाये एक नया मुद्दा दे रहे हैं। ऐसा करना बिजली राजस्व प्रणाली को मटियामेट करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। 

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