हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर दशहरा मनाया जाता है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज यानी 20 अक्टूबर को दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान श्री राम ने लंकापति रावण का वध करके माता सीता को मुक्त कराया था। इस अवसर पर देशभर में रावण दहन किया जाता है।
रावण दहन के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। दशहरा के दिन रावण दहन प्रदोष काल में करने का अधिक महत्व है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर प्रदोष काल में ही क्यों रावण का पुतला फूंका जाता है? अगर नहीं, तो आइए इस आर्टिकल में विस्तार से जानते हैं इसके पीछे के रहस्य के बारे में।
क्यों खास है प्रदोष काल?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्यास्त के आसपास का समय प्रदोष काल कहलाता है। इसी मुहूर्त में रावण दहन करने का विधान है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, प्रदोष काल में शुरू किया गया शुभ काम हमेशा सफल होता है। दशहरा के दिन इसी मुहूर्त में रावण का पुतला जलाकर अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व मनाया जाता है। दिन और रात के मिलने के समय को प्रदोष काल कहा जाता है। हिंदू धर्म में प्रदोष काल और गोधूलि बेला को नकारात्मक और आसुरी शक्तियों के प्रभाव को खत्म करने के लिए सबसे उपयुक्त समय माना गया है।
नकारात्मक शक्तियों के प्रभाव को रोकना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यास्त के बाद नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव काफी बढ़ जाता है। रात के अंधेरे में इन शक्तियों का प्रभाव और न बढ़े। इसलिए रावण का दहन प्रदोष काल में ही कर दिया जाता है, ताकि नकारात्मक ऊर्जा हावी न हो सके।
प्रदोष काल में जरूर करें ये काम
हिंदू धर्म में प्रदोष काल का विशेष महत्व है। इस दौरान भगवान शिव की पूजा-अर्चना करना बेहद फलदायी माना जाता है।
प्रदोष काल में कच्चे दूध, गंगाजल, दही और शहद से शिवलिंग का रुद्राभिषेक करें।
शिव जी को प्रसन्न करने के लिए उन्हें बेलपत्र, भांग, धतूरा और सफेद पुष्प अर्पित करें।
मंदिर में शिव प्रतिमा के सामने या घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं।
रुद्राक्ष की माला से ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का सच्चे मन से जाप करें।
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