हिंदू धर्म में किसी भी नवरात्र में से शारदीय नवरात्र को विशेष माना जाता है और इस दौरान भक्त माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा करते हैं। यह पर्व पूरे नौ दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है और दशहरा से इस व्रत का समापन होता है।
नवरात्र साल में चार आती है जिनमें से आश्विन महीने में पड़ने वाली शारदीय नवरात्र को अलग तरीके से मनाया जाता है। इस दौरान भक्तजन व्रत-उपवास करते हैं और अन्य उपायों से माता को प्रसन्न करते हैं। इनमें से एक उपाय माना जाता है दुर्गा सप्तशती का पाठ करना। यह एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें माता दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की महिमा का वर्णन मिलता है।
दुर्गा सप्तशती का पाठ शुरू करते समय सबसे पहले देवी कवच और उसके बाद अर्गला स्रोत पढ़ा जाता है। अर्गला स्रोत पढ़ने से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं और उनके ऊपर माता दुर्गा की कृपा बनी रहती है। आइए जानें अर्गला स्रोत पढ़ने के फायदों के बारे में।
शारदीय नवरात्र में अर्गला स्तोत्र का पाठ जरूरी क्यों है?
श्री दुर्गा सप्तशती में देवी कवच के बाद अर्गला स्तोत्र का वर्णन मिलता है। इसके नाम में ही इसका महत्व दिखाई देता है। अर्गला का अर्थ होता है अग्रणी और सारी बाधाओं को दूर करने वाला।
नवरात्र के नौ दिनों में या किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए इस पाठ को करना जरूरी होता है। अर्गला स्तोत्र के मंत्रों में देवी भगवती से इस बात की कामना की जाती है कि हमारे शत्रुओं का नाश हो और जीवन में सफलता मिले। इस स्रोत का पाठ करने वाले भक्त की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे पापों से मुक्ति मिलती है।
अर्गला स्तोत्र क्या होता है?
ॐ नमश्चण्डिकायै
[ मार्कण्डेय उवाच ]
ॐ नमश्चण्डिकायै॥
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥
महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥
शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥
वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥
अचिन्त्यरुपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥
नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥
स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि१॥10॥
चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥
विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥
विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥
सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥
विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥
प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥
चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥
कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥
हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥
इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥
देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥
देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके।
रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥
पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥
इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः।
स तु सप्तशतीसंख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥
अर्गला स्तोत्र का पाठ करने के फायदे
अर्गला स्तोत्र का बहुत महत्व है क्योंकि यह देवी दुर्गा का आशीर्वाद और सुरक्षा पाने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है। इस स्तोत्र में नकारात्मक ऊर्जाओं को दूर करने, सौभाग्य लाने और भक्त को शक्ति, साहस और बुद्धि देने की क्षमता होती है।
अर्गला स्तोत्र का पाठ करना देवी शक्ति का सम्मान करने का भी एक तरीका माना जाता है, जो शारदीय नवरात्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस स्तोत्र का पाठ करके, भक्त माता दुर्गा के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करते हैं और दया, सहानुभूति और निस्वार्थ भाव जैसे गुण अपनाते हैं।
इसके अलावा, अर्गला स्तोत्र बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है और इसका पाठ भक्तों को अन्याय के खिलाफ खड़े होने और सही के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करता है।
अगर आप भी शारदीय नवरात्र में दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं, तो इससे पहले अर्गला स्तोत्र का पाठ अवश्य करें।
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