श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद ब्रजभूमि में हमारी श्री राधा रानी का प्राकट्य दिवस मनाया जाता है। भक्त इस दिन राधा अष्टमी का पर्व बेहद उत्साह के साथ मनाते हैं। राधा अष्टमी का यह खास पर्व आज यानी 19 सितंबर को मनाया जा रहा है।
राधा रानी के जन्म पर मंदिरों में तो भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है और घर में भी लोग विधि-विधान के साथ उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। राधा रानी की पूजा में सबसे प्रमुख माना जाता है उन्हें सोलह श्रृंगार अर्पित करना। आइए आपको बताते हैं आखिर क्यों राधा अष्टमी पर किशोरी जी को सोलह श्रृंगार अर्पित करने की परंपरा इतनी प्रचलित है और इसका महत्व क्या है?
राधारानी को क्यों चढ़ाया जाता है सोलह श्रृंगार?
राधा अष्टमी के दिन राधा रानी का जन्म हुआ था और इस दिन की पूजा में किशोरी जी को सोलह श्रृंगार चढ़ाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राधा रानी को द्वापर युग में श्री कृष्ण ने सोलह श्रृंगार से सजाया था, इसलिए आज भी जो भक्त उन्हें सोलह श्रृंगार चढ़ाता है उसके ऊपर राधे-कृष्ण की विशेष कृपा दृष्टि बनी रहती है। यही नहीं यदि सुहागिन महिलाएं राधा रानी का सोलह श्रृंगार करती हैं, तो उन्हें अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है।
राधा रानी के सोलह श्रृंगार में क्या-क्या चढ़ता है?
राधा रानी को सोलह श्रृंगार में चढ़ाई जाने वाली हर सामग्री का विशेष महत्व है और ये किसी न किसी चीज का प्रतीक मानी जाती हैं। आइए जानें क्या हैं सोलह श्रृंगार-
बिंदी- राधा रानी के माथे पर सजावट के लिए बिंदी लगाई जाती है। यह तीसरी आंख के स्थान को दिखाती है और एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती है।
सिंदूर- बालों की मांग के बीचों-बीच में लगाया जाने वाला सिंदूर वैवाहिक स्थिति और समर्पण का प्रतीक होता है।
मांग-टीका- इसे माथे पर पहना जाता है और इसे वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के मिलन का प्रतीक माना जाता है।
काजल-आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के साथ-साथ बुरी नजर से बचाने के लिए काजल का टीका लगाया जाता है।
नथ- यह किसी भी विवाहित स्त्री की सुंदरता को बढ़ाती है और इसे स्त्री तत्व का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है।
कर्ण-फूल- कानों की बालियां स्त्रियों की सुंदरता को बढ़ाने वाले आभूषण में से एक मानी जाती हैं।
मंगलसूत्र -प्यार, निष्ठा और पति की दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
मेहंदी- मेहंदी को सुहाग की निशानी माना जाता है और यह हाथों और पैरों पर लगाई जाती है।
चूड़ियां- राधा रानी को कांच की चूड़ियां चढ़ाई जाती हैं, क्योंकि यह समृद्धि और सौभाग्य का प्रतीक मानी जाती हैं।
बाजूबंद- यह स्त्रियों की सुंदरता को बढ़ाता है और शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
अंगूठी- अंगूठी को एकता का प्रतीक माना जाता है।
कमरबंद- यह स्त्रियों की कमर की सुंदरता को उभारता है।
पायल- पायल की आवाज वातावरण में सकारात्मकता घोलती है।
बिछिया- पारंपरिक रूप से विवाहित होने का प्रतीक मानी जाती हैं।
आलता- इसे सुहाग की सामग्री माना जाता है और राधा रानी के हाथों और पैरों में आलता लगाना जरूरी माना जाता है।
साड़ी या लहंगा- राधा रानी को मुख्य रूप से नीले रंग की पोशाक चढ़ानी चाहिए, क्योंकि नीला रंग श्री कृष्ण के प्रिय रंग है।
इस प्रकार राधा रानी की पूजा में सोलह श्रृंगार चढ़ाना श्री कृष्ण की कृपा पाने का सबसे आसान माध्यम माना जाता है। जो भी स्त्री किशोरी जी को यह सामग्रियां चढ़ाने के साथ स्वयं भी सोलह श्रृंगार करके राधा और कृष्ण की पूजा करती है, उसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और उनके वैवाहिक जीवन में प्रेम सर्वदा बना रहता है। यही नहीं यदि कुंवारी लड़कियां सोलह श्रृंगार चढ़ाती हैं तो उन्हें अच्छे जीवनसाथी का आशीर्वाद मिलता है।
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