भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी कई कथाएं हम सभी ने सुनी हैं। उनके बालकाल से लेकर युवा स्वरूप और फिर द्वारिकाधीश के रूप में उनके राजा की भूमिका से जुड़ी कई कहानियां, हमारे मन में छपी हुई हैं। लेकिन हर कृष्ण भक्त के मन में यह सवाल उठता है कि भगवान श्रीकृष्ण की जब मृत्यु हुई तब उनके शव का क्या हुआ? महाभारत के मौसुल पर्व में अध्याय 4 और 5 में यादव वंश के अंत और श्रीकृष्ण के देह त्याग का विस्तृत वर्णन मिलता है। चलिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा के बारे में जानते हैं।
महाभारत में क्या लिखा है ?
महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद जब श्री कृष्ण देवी गांधारी के पास गए और उन्हें 100 पुत्रों की मृत्यु की सांत्वना देने लगे तो देवी गांधारी ने दुखी होकर और विलाप करते हुए श्री कृष्ण को श्राप दिया कि जिस तरह से कौरवों का अंत हुआ है ठीक उसी तरह से यादवों का भी अंत होगा। गांधारी के श्राप का फल श्री कृष्ण को मिला और सच में यादवों का विनाश हो गया । इसके बाद श्री कृष्ण की भी मृत्यु हो गई। महाभारत के अनुसार, श्रीकृष्ण के देह त्याग के बाद उनके पार्थिव शरीर का विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया गया था।
श्रीकृष्ण ने कैसे त्यागा अपना शरीर?
यादवों के बीच हुए भयंकर संघर्ष और विनाश के बाद श्रीकृष्ण एकांत वन में चले गए। वहां वे योग की अवस्था में एक वृक्ष के नीचे विश्राम कर रहे थे और मन ही मन में द्वारिका का विनाश होते देख रहे थे।
उसी समय जरा नाम का एक शिकारी वहां पहुंचा। दूर से उसे श्रीकृष्ण का पैर हिरण के शरीर के किसी हिस्से जैसा दिखाई दिया। श्रीकृष्ण के पैरों के तलवों की चमक उस शिकारी को हिरण की आंख जैसी लगी और उसने पैरों को हिरण समझकर बाण चला दिया।
जब शिकारी को अपनी भूल का पता चला, तो वह बहुत दुखी हुआ। श्रीकृष्ण ने उसे क्षमा कर दिया और समझाया कि इसमें उसकी जानबूझकर की गई कोई गलती नहीं थी। इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और बैकुंठ की ओर प्रस्थान कर लिया।
अर्जुन ने किया श्रीकृष्ण का अंतिम संस्कार
महाभारत के मौसुल पर्व के आगे के अध्यायों में श्रीकृष्ण के अंतिम संस्कार से जुड़ी घटनाओं का वर्णन मिलता है। श्रीकृष्ण के देह त्याग और यादवों के विनाश की खबर जब अर्जुन तक पहुंची, तो वे तुरंत द्वारका आए। अर्जुन श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय सखा थे और रिश्ते में उनके भाई भी थे। वहां पहुंचने के बाद उन्होंने इस विनाशकारी घटना का सामना किया। कथा के अनुसार, उन्होंने श्रीकृष्ण के पार्थिव शरीर को भी देखा। यह अर्जुन के लिए बेहद भावुक और दुखद समय था। जिन श्रीकृष्ण ने जीवनभर उनका मार्गदर्शन किया था, अब वे भौतिक रूप में उनके साथ नहीं थे।
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