भारत में लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों यानी नॉन कम्युनिकेबल डिजीज का आंकड़ा साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है। यह लोगों को अपनी खराब आदतों और रहन-सहन को गौर कर उनमें सुधार करने के लिए मजबूर कर रहा है।
इनमें भी हाई बीपी और डायबिटीज के मामले इतने बढ़ गए हैं कि अब तो दुनिया में भारत को डायबिटीज कैपिटल तक कहा जाने लगा है। इससे जुड़ी हाल ही में एक स्टडी सामने आई है, जिसमें कहा गया है कि हाई बीपी और डायबिटीज के साथ डिमेंशिया का खास कनेक्शन है। दरअसल, यह रिपोर्ट कहती है कि अगर व्यक्ति इस तरह की बीमारियों से पीड़ित न हो तो उनमें आगे चलकर उम्र बढ़ने के साथ डिमेंशिया का जोखिम बहुत हद तक कम हो जाता है।
13 साल ज्यादा डिमेंशिया फ्री जिंदगी
न्यूरोलाजी जर्नल में छपे इस शोध से पता चला है कि बढ़ती उम्र के दौरान सामान्य ब्लड प्रेशर, डायबिटीज न होना और स्मोकिंग जैसी लत न होने से डिमेंशिया का खतरा बेहद कम हो जाता है। इस शोध के मुताबिक, औसतन 13 साल ज्यादा डिमेंशिया से फ्री जिंदगी मिल सकती है। इस बारे में न्यूयार्क विश्वविद्यालय के आप्टिमल एजिंग इंस्टीट्यूट के फाउंडिंग डायरेक्टर और वरिष्ठ शोधकर्ता जोसेफ कोरेश ने कहा, “अध्ययन बताता है कि एक दशक से अधिक समय तक दिमाग की सेहत बनाए रखने की रणनीति के तौर पर लोगों को 50 से 60 साल की उम्र में इन खतरों से सक्रिय रूप से बचना चाहिए।”
मिडलाइफ में स्वस्थ आदतों से बढ़ती उम्र में फायदा
शोधकर्ताओं ने 1986 में शुरू हुई कम्युनिटी-बेस्ड एथेरोस्क्लेरोसिस रिस्क इन कम्युनिटीज अध्ययन के 12,409 लोगों के डाटा का विश्लेषण किया। इन आंकड़ों पर औसतन 56 साल की उम्र वाले इन लोगों को 26 साल तक ट्रैक किया गया। इस दौरान 3,008 लोगों को डिमेंशिया हुआ, जिनमें से करीब 5,238 लोगों की मौत डिमेंशिया हुए बिना हो गई।
इस दौरान यह भी देखा गया कि जिन लोगों में कोई रिस्क फैक्टर नहीं था, वे तीनों रिस्क फैक्टर वाले लोगों की तुलना में लगभग 13 साल ज्यादा समय तक डिमेंशिया से बचे रहे। वहीं, जिन लोगों में मिडलाइफ में कोई भी वैस्कुलर रिस्क फैक्टर यानी हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, स्मोकिंग नहीं था, उन्होंने इन खतरों वाले लोगों की तुलना में लगभग 13 साल ज्यादा डिमेंशिया मुक्त जीवन बिताया।
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