‘कलम’ से सिनेमा को बनाया यादगार; पाकिस्तान में गुम हुआ था ये सुपरस्टार

सिनेमाघरों से निकलने के बाद अक्सर हमें फिल्मों के दमदार डायलॉग याद रह जाते हैं, लेकिन उनके पीछे कौन है? किसके लिखे डायलॉग्स पर हम तालियां बजा रहे हैं, उस शख्स के बारे में किसी को कुछ नहीं पता होता।

आज हम आपको 50 और 60 के दशक के एक ऐसे ही मशहूर डायलॉग राइटर और फिल्म डायरेक्टर के बारे में बता रहे हैं, जो ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंचने वाले पहले भारतीय थे और जिन्होंने अपनी अंतिम सांस पाकिस्तान में ली। उनकी डेथ एनिवर्सरी पर पढ़ें उनकी दिलचस्प कहानी।

ऑस्कर नॉमिनेशन में जाने वाले पहले भारतीय

जिस शख्सियत का जिक्र हम अपने इस लेख में कर रहे हैं, वह वजाहत हुसैन मिर्जा चंगेजी हैं, जिन्हें हिंदी सिनेमा में लोग ‘वजाहत मिर्जा’ के नाम से जानते हैं। वह 50 और 60 के दशक के सबसे सक्सेसफुल स्क्रीनराइटर रह चुके हैं। वजाहत मिर्जा ने बतौर राइटर करियर की शुरुआत साल 1933 में फिल्म ‘यहूदी की लड़की’ से की थी, इसके बाद उन्होंने ‘हम तुम और वो’, ‘तीन सौ दिन के बाद’, ‘वतन’, ‘एक ही रास्ता’, ‘औरत’, ‘बहन’, ‘रोटी’, ‘लाल हवेली’, ‘मुगल-ए-आजम’ और ‘मदर इंडिया’ जैसी फिल्मों के डायलॉग्स लिखे।

उनकी सबसे सफल फिल्मों में से एक ‘मुगल-ए-आजम’ है, जिसके लिए उन्हें बेस्ट डायलॉग राइटर के दो बार अवॉर्ड्स भी मिले। वजाहत मिर्जा पहले ऐसे भारतीय थे जो फिल्म ‘मदर इंडिया’ के लिए ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंचे थे।

पाकिस्तान में बिताए थे अपने अंतिम दिन

20 अप्रैल 1908 को वजाहत मिर्जा का जन्म लखनऊ से दूर एक छोटे से गांव ‘इस्लामपुर’ में हुआ था। उन्होंने गवर्नमेंट जुबली इंटर कॉलेज से अपनी पढ़ाई की और इस दौरान ही उनकी मुलाकात कलकत्ता के सिनेमैटोग्राफर कृष्ण गोपाल से हुई, जिसके बाद उन्होंने उनके असिस्टेंट के तौर पर काम किया। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे में सिंगर मदन कुमार के साथ मिलकर ‘अनोखी मोहब्बत’ नाम की फिल्म प्रोड्यूस की। उन्होंने न सिर्फ स्क्रीनराइटर के तौर पर काम किया, बल्कि 1945 में ‘प्रभु का घर’ नाम की फिल्म भी डायरेक्ट की, जो हिट रही। वजाहत मिर्जा ने अपने पूरे करियर में पांच फिल्मों का निर्देशन किया।

इंडिया में खूब नाम कमाने के बाद वह पाकिस्तान चले गए। आईएमडीबी की रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वह अपने परिवार के पास चले गए थे। उनके भाई मुर्तजा पहले से ही पाकिस्तान में बसे हुए थे और फिल्म जगत से जुड़े हुए थे। वजाहत मिर्जा ने 4 अगस्त 1990 को अपनी मौत से पहले अपने अंतिम दिन पाकिस्तान में ही बिताए थे।

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