सावन का महीना आते ही छोटे-बड़े हर शिव मंदिर में भक्तों की भीड़ इकट्ठा होने लगी है। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में स्थित शिवराजपुर का प्राचीन खेरेश्वर मंदिर में भी आजकल श्रद्धालुओं की लंबी-लंबी कतार देखी जा रही है। हालांकि, इस मंदिर में केवल कानपुर नगर से ही नहीं बल्कि आस-पास के छोटे-छोटे गांव और कस्बों से भी लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाने आते हैं।
यह कोई आम मंदिर नहीं है, बल्कि यह बहुत प्राचीन है और इससे जुड़ी धार्मिक कथा का जिक्र स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंदिर के शिवलिंग का जुड़ाव महाभारत काल से है। चलिए हम आपको इस मंदिर से जुड़े रहस्य के बारे में बताते हैं।
महाभारत काल से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
कानपुर का खेरेश्वर मंदिर बहुत पौराणिक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में सबसे पहले शिव जी पर जल गुरु द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा चढ़ाते हैं। ऐसा एक या दो दिन नहीं बल्कि हर रोज होता है और बरसों से होता चला आ रहा है। द्वापर युग में इस मंदिर में गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा शिव जी की आराधना किया करते थे।
अश्वत्थामा को भगवान श्री कृष्ण ने श्राप दिया था कि वह चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहेंगे यानी उन्हें अमरत्व का श्राप कहें या वरदान, मिला हुआ था।
महाभारत युद्ध के वक्त पिता गुरु द्रोणाचार्य के साथ वह कौरवों की सेना की ओर से युद्ध लड़ रहे थे। 18वें दिन जब पांडव युद्ध जीत गए, तब अश्वत्थामा ने क्रोधवश युद्ध भूमि में शिविर के अंदर सो रहे द्रौपदी के सभी पुत्रों की हत्या कर दी। तब श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया था कि उन्होंने जितने भी पाप किए हैं, उन सभी के पापों को हजारों वर्ष तक अश्वत्थामा को ढोना पड़ेगा। आज भी पृथ्वी के निर्जन स्थानों पर अश्वत्थामा भटकते हैं।
भगवान शिव का अंश थे अश्वत्थामा
गुरु द्रोणाचार्य और माता कृपि ने भगवान शिव की कड़ी तपस्या की थी, उसके बाद उन्हें भगवान शिव और यम के अंश के रूप में अश्वत्थामा की प्राप्ति हुई थी। इसलिए अश्वत्थामा को शिव जी का बहुत बड़ा भक्त कहा गया। कानपुर के खेरेश्वर मंदिर में आज भी जब सुबह मंदिर के कपाट खुलते हैं, तब शिव जी पर जल और फूल चढ़े हुए मिलते हैं।
अतः इस प्राचीन मंदिर में सालभर भक्त शिव जी को जल चढ़ाने आते हैं, मगर सावन में इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है।
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