क्या दान देकर वापस मांगना महापाप है? यहां पढ़ें राजा नृग की कथा

भारतीय जीवन-दृष्टि मनुष्यत्व की चरितार्थता के चार आयाम निरूपित करती है। धर्म,अर्थ काम एवं मोक्ष के भेद से ये आयाम पुरुषार्थ-चतुष्टय कहलाते हैं। परस्पर एक दूसरे की सिद्धि में सहायक हो सकें, इस अनुशासन में इन पुरुषार्थों की सिद्धि का विधान किया गया है। अर्थ एवं काम पुरुषार्थ धर्मानुमोदित होकर ही सार्थक होते हैं, ऐसा बारम्बार दुहराया गया है। वित्त, द्रव्य, सम्पत्ति, साधन तथा धन आदि के नाम से अर्थ का तात्पर्य ग्रहण किया जाता है। यह वित्त अथवा धन किस प्रकार उपार्जित किया जाय तथा किस प्रकार व्यय किया जाये, इसको लेकर धर्मशास्त्रों में साथ ही पारम्परिक भारतीय जीवन में अनेक विश्वास प्रचलित हैं। न्यायपूर्ण उपार्जन तथा विवेकपूर्ण विनियोग से अर्थ पुरुषार्थ की सार्थकता होती है।

मनुस्मृति के अनुसार सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता ही मुख्य है। जिसका धनार्जन शुद्ध है वही शुद्ध है। पवित्र धनार्जन होने से ही क्रियाओं की शुद्धि होती है, मिट्टी-जल आदि से नहीं- “सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम्। योऽर्थेशुचिर्हि स शुचिर्न मृद्वारिशुचिः शुचिः॥” अर्थ की यह शुचिता उपार्जन की पद्धति, उसके समुचित विनियोग एवं दान के द्वारा होती है। यहाँ दान शब्द को ठीक से समझना चाहिए। दान को अर्थ की शुद्धि का मुख्य कारक कहा गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है कि जैसे आत्मज्ञान से आत्मा की शुद्धि होती है वैसे ही दान से धन की शुद्धि होती है ‘शुध्यन्ति दानैः सन्तुष्ट्या द्रव्याण्यात्माऽऽत्मविद्यया।’ भर्तृहरि के नीतिशतक में इसको सुन्दर रीति समझाते हुए कहा गया है कि तीन गतियाँ हैं, दान-भोग एवं नाश। जो दान तथा भोग दोनों नहीं कर पाते उनकी धन की नाशरूप तीसरी गति स्वतः हो जाती है- ‘दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य। यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति।’

इन दिनों प्रसंगवश दान तथा दानदाता दोनों ही चर्चा में हैं। इन चर्चाओं के बीच हमें दान, चढ़ावा तथा चन्दा जैसे शब्दों और उनकी क्रियाओं को समझना चाहिए। दान की परिभाषा करते हुए कहा गया है ‘देवता-ब्राह्मणादि के निमित्त विधिपूर्वक द्रव्यत्याग-देवताब्राह्मणादिसम्प्रदानकद्रव्यमोचनम्।’ यहाँ आदि से दान के अन्य पात्रों एवं सम् उपसर्ग द्वारा उसकी विधि का संकेत किया गया है। कूर्मपुराण में दान को निरूपित करते हुए कहा गया है – अर्थानामुदिते पात्रे श्रद्धया प्रतिपादनं- अर्थात् धन होने पर पात्र में उसका प्रतिपादन करना दान है।

अमरकोश में दान के पर्याय त्याग, उत्सर्ग, विसर्ग, वितरण तथा निर्वपण आदि शब्द कहे गये हैं। दान का भारतीय धर्मग्रन्थों में बहुविध प्रतिपादन किया गया है। हम संक्षेपतया श्रीमद्भगवद्गीता से समझते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश करते हुए दान के सात्त्विक, राजस और तामस तीन भेद किये हैं। दान कर्त्तव्य है, ऐसा मानकर समय, स्थान एवं पात्र की योग्यता होने पर किसी प्रत्युपकार की भावना से सर्वथा मुक्त होकर किया गया दान सात्त्विक है।

प्रत्युपकार अथवा अपने लिए प्रतिफल की लालसा से कष्टपूर्वक किया गया दान राजस है। तीसरे तामस दान का स्वरूप बताते हुए कहा कि समय और स्थान का विचार किये बिना अपात्र को निरादरपूर्वक किया गया दान तामस है। इन तीनों प्रकारों को समझते हुए हमारे सम्मुख अनेक विचार-बिन्दु स्पष्ट होते हैं। दान देकर उससे यश-प्रतिष्ठा की लालसा, दिए हुए दान में अभिनिवेशपूर्वक ममत्व रखना, दान दे चुकने पर गृहीता का किसी भी कारण अपमान करना आदि दान के स्वरूप को नष्ट करने वाले कार्य हैं। वस्तुतः, दान करने के ही क्षण में दातव्य वस्तु पर दाता का अधिकार शून्य हो जाता है। यदि कोई दिए हुए दान के प्रति अपना आग्रह रखता है तो वह व्यावसायिक निवेश हो सकता है, उसे दान नहीं कह सकते।

इसी प्रकार दान के पुनरावर्त्तन का भी कोई मार्ग नहीं। स्वेच्छया दान कर चुकने के बाद यदि कोई मन से भी उस का पुनरादान सोचे तो पाप ही है। सुप्रसिद्ध कथा है कि महाराजा नृग ने असंख्य गायों का दान किया। उनकी दान की हुई गायों में से एक गाय पुनः उनके दातव्य गायों में आकर मिल गयी और प्रमादवश राजा ने उसका दुबारा दान कर दिया। इस पाप के फलस्वरूप उनको वर्षों तक गिरगिट होकर कुएँ में रहना पड़ा, जिसका बाद में भगवान् द्वारकाधीश ने उद्धार किया। बदलते युग में यह एक प्रवृत्ति विकसित हुई है जिसमें दाता अपने दान की समीक्षा करता रहता है, जैसे बैंक ऋण देकर उसके ब्याज और मूल की चिन्ता करते हैं।

सावधानी से देखेंगे तो हमें भारतीय जीवन में अर्थतन्त्र का एक अत्यन्त सूक्ष्म किन्तु प्रभावशाली ढाँचा दिखाई देगा, जो दान कहलाता है। सञ्चित हुए धन का विकेन्द्रीकरण बिना उपद्रव के होता रहे यह दान से सुनिश्चित होता है। इस हेतु देवता-ब्राह्मण शब्द का उल्लेख विचारणीय है। त्यागशील रहकर जीवन-यापन मात्र ही द्रव्य का उपयोग करने वाले पात्र को दान किया जाता है। देवता गृहीता होकर प्रस्तुत नहीं होता, वह आकांक्षी नहीं है। उसके निमित्त अर्पित द्रव्य से उसके लोकोपकार की प्रतिज्ञा का ही सम्पादन होता है, अतः वह चढ़ावा कहलाता है।

ब्राह्मण के लिए लिए प्रदत्त द्रव्य ब्रह्मस्व कहलाता है, जबकि देवता के निमित्त अर्पित द्रव्य देवस्व कहलाता है। इन दोनों का ही उपयोग जिनका द्रव्य है उनके स्वरूप के अनुरूप ही होना चाहिए। यह जानना सुखद आश्चर्य हो सकता है कि पीढ़ियों में भारतवर्ष में संचालित गुरुकुल मठों द्वारा उनके ही भूमि-भवनों पर स्थापित हैं। अनेक विद्या-परम्पराओं का संरक्षण आश्रमों में ही सम्भव हुआ है। उनमें देवस्व तथा ब्रह्मस्व का सर्वाधिक उपयोग होता आया है। उनकी प्रामाणिकता और पवित्रता से प्रभावित राजाओं अथवा धनिकों ने उनको दान अथवा वृत्तियाँ प्रदान कीं। किन्तु यह दान, दाताओं को मठों का स्वत्वाधिकारी नहीं बनाता। लोकहित के लिए धन का विनियोग करते हुए राज्य राजस्व का ही उपयोग कर सकते हैं, देवस्व अथवा ब्रह्मस्व का नहीं। यह भारत का चिराचरित जीवन रहा है। किसी सदुद्देश्य के लिए अनेक व्यक्तियों से थोड़ा-थोड़ा धन संग्रह करके संचित राशि का उपयोग करने की भी पद्धति है, जिसे चन्दा कहा जाता है। इसमें किसी का प्राधान्य नहीं होता, कोई एक इस सञ्चित राशि का स्वामी भी नहीं होता। यह संकल्पित उद्देश्य हेतु संगृहीत राशि होती है और उसी उद्देश्य में विसर्जित की जाती है।

अभी श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र में प्रस्तुत एक अवाञ्छित प्रसंग ने एक ओर तो श्रद्धालु समाज को दुःखित किया परन्तु दूसरी ओर इसी प्रसंग ने बहुत अधिक चकित भी किया है। जहाँ-तहाँ से अकस्मात् सामने आते हुए दान-दाताओं ने विचित्र आतुरता का प्रदर्शन किया। अपने दान में उनके आग्रह और क्लेशभाव ने उस दान का पुण्यफल जैसे मलिन कर दिया। किसी-किसी ने तो अपना दान वापस पाने की अभिलाषा भी प्रकट कर दी। यद्यपि यह धर्म, परम्परा अथवा विधि किसी प्रकार उचित नहीं है। इन दृश्यों से प्रकट हुआ कि हम कितनी गहन राजनैतिक दुष्प्रेरणाओं तथा कैसे अभारतीय भाव के बीच आ पहुँचे हैं। कोई दाता, कोई सहायक अथवा हितैषी जब अपनी सहायता अथवा दानशीलता का उपयोग अंकुश के रूप में करे तो उसे सहायक के स्थान पर वञ्चक समझना उचित होगा।

स्वस्थ भारतीय परम्परा में दान कोई अनुबन्ध नहीं है। यह अपने को ही धन्य करने का अनुष्ठान है। गृहीता दान-ग्रहण करके दाता को ही उपकृत करता है। दान से प्राप्त द्रव्य का क्या कैसा उपयोग हो, यह एक स्वतन्त्र मीमांसा का विषय है। पारम्परिक भारतीय जीवन हजारों वर्षों से इसका आदर्श प्रस्तुत करता आया है, जिसकी चर्चा फिर कभी। आज इतना भर ही कि हमें अपनी क्रियाओं के स्वरूप का बोध होना अपेक्षित है जिससे वे अनर्थकारिणी न हो जायें।

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